रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है। अव्यक्तता व्यक्त बीच अर्जुन, इस तरह शोक क्या उचित रहा।-28
कुछ ऐसे महापुरुष होते, आश्चर्य स्वरूप लखे इसको,
कुछ रहे दूसरे जन ऐसे, आश्चर्य स्वरूप कथें इसको।
कुछ होते हैं जो सुनते हैं, आश्चर्य रूप वर्णन इसका
कुछ को स्वरूप आत्मा का यह, सुनकर भी समझ नहीं आता।-29
तन में आत्मा जो वास करे, वह कभी न मारा जा सकता,
आत्मा अविनाशी तन अनित्य, फिर किसके लिये शोक करता।
हे भारत, प्राणी कौन जिसे, तू योग्य शोक में समझ रहा,
रे नहीं देह में देही नित-बँधकर चिरकाल रहा।-30
संकट में जो रक्षा करता, वह क्षत्रिय है तू हे अर्जुन,
तू अपना धर्म विचार समझ, निश्चय कर ले तू अपने मन,
इस धर्म युद्ध से भी बढ़कर हितकर साधन क्या अन्य रहा,
संकोच न कर, कर धर्म युद्ध, भावुकता में तू व्यर्थ बहा।-31 क्रमशः…