श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 68 वी कड़ी..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 68 वी कड़ी..     

साँतवा अध्याय :- ज्ञान-विज्ञान योग

मुझको न जानने वाले वे, मतिहीन मनुज यह समझ रहे,

व्यक्तित्व रूप वह मेरा है, आराधक जिसको विरच रहे।

वह अल्पज्ञान ही है उनका, वे मुझे नहीं पहिचान सके,

उत्तम अविनाशी मम स्वरूप, उर में न इसे धार सके।।-24

अल्पज्ञ मूढ़ जन के आगे, मैं प्रगट न होता कभी पार्थ,

नित रखूँ छिपाकर माया में, उन लोगो से अपना यथार्थ।

माया मोहित यह जगत अस्तु, जाने न अजन्मा अच्युत को,

नित अविनाशी जिसका स्वरूप, उस परातत्व को या मुझको।-25

 

हे अर्जुन मैं भगवान स्वयं, सारे घटनाक्रम जान रहा

जो पूर्वकाल में घटित हुए, या घटे आज, मैं जान रहा

कल क्या भविष्य में घटना है, इसका भी ज्ञान रहा मुझको

मैं जान रहा सब जीवों को, कोई न जानता पर मुझको।-26

 

हे अर्जुन इच्छा द्वेषजन्य-द्वन्द्वों का जग विस्तार रहा,

सुख-दुख, शुभ-अशुभ, विषाद-हर्ष इनका मन पर अधिकार रहा।

मोहित है जीव जगत के सब, इन पर भ्रमजाल रहा गहरा,

मन बुद्धि जीव के सम्मोहित, उन पर द्वन्द्वों का है पहरा।।-27

 

पर जिसने पुण्य सुकर्म किये, परिशुद्ध आचरण है जिनका,

सम्पूर्ण पाप जिनके विनष्ट, है, चित्त शान्त संयत जिनका।

वे मुक्त मोह से हुए पुरुष, भजते मुझको अविराम पार्थ,

निष्ठा पूर्वक सेवा करते, तत्वार्थ प्राप्त करते यथार्थ।-28

 

जो जरा मरण से मुक्ति हेतु, करते प्रयत्न प्रतिपल अर्जुन,

वे भक्ति भाव के आश्रय से, वश में कर लेते अपना मन।

वे हैं यथार्थ ही ब्रह्मभूत इसलिये कि तत्व को वे जाने,

अध्यात्म, सकाम कर्म की विधि, सम्पूर्ण रूप से पहिचाने।-29

 

जो जाने तत्व प्रकृति के क्या, परमेश्वर क्या जो यह जाने,

आधार देवता यज्ञों का, है कौन, उसे जो पहिचाने।

इन तत्व रूप में भक्तों ने, जितना जो भी मुझको जाना,

अन्तिम क्षण में संयत मति से, भक्तों ने मुझको पहिचाना।-30

॥ इति सप्तम अध्याय