श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 67 वी कड़ी..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 67 वी कड़ी..     

साँतवा अध्याय :- ज्ञान-विज्ञान योग

यों तो उदार सब मुक्त रहे, पर जिसने मुझको पहिचाना,

हो गया तत्व का ज्ञान जिसे, उसको मैंने अपना माना।

मैं मान रहा वह मुझमें ही, रह रहा, भक्त मेरा ज्ञानी,

पर भक्ति-परायण रहकर नित, उसको मेरी पदवी पानी।-18

 

कितने जनमान्तर गत होते तब जीव ज्ञान पाने पाता,

मैं सभी कारणों का कारण ज्ञानी यह तत्व ज्ञान पाता,

मैं रहा सर्वव्यापक मेरे – शरणागत होता जब ज्ञानी,

दुर्लभ महात्मा है ऐसा, मैं करता उसकी अगुआनी।-19

वे भक्त जीव जिनकी मति का, कर लिया हरण इच्छाओं ने

अनन्य देव को पूज रहे, आराधना का प्रतिफल पाने।

जिसका स्वभाव जैसा होता वैसी उपासना विधि उसकी,

विश्वास रहा जिसका जैसा, वैसी उसकी इच्छा फलती।-20

 

मैं जीवमात्र के अन्तस में, ईश्वर बनकर नित वास करूँ,

इसलिए जीव की हर इच्छा, होती है क्या, उसको समझें।

जिस देव रूप के प्रति जैसी, श्रद्धा रखता पूजन करता,

मैं श्रद्धा के अनुरूप उसे, उस देव-भक्ति में स्थिर करता।-21

 

श्रद्धापूर्वक आराधना कर, इच्छित भोगो को प्राप्त करे,

उसने यह फल किससे पाया, रहता रहस्य वह क्या समझे।

उसने जो इच्छित फल पाये, मैं ही उनका देने वाला,

उसके देवों की श्रृद्धा में, मैं ही होता रहने वालो।-22

 

वे अल्पबुद्धि मानुष अर्जुन, जो फल पाने पूजन करते,

सीमित क्षण भंगुर फल होते, जो देवो से उनको मिलते।

भजते हैं जो जिन देवों को, उनके ही लोक उन्हें मिलते,

मम भक्तों को पर परमधाम, मिलता है वे मुझमे मिलते।-23   क्रमशः…