श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 66 वी कड़ी..     

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 66 वी कड़ी..     

साँतवा अध्याय :- ज्ञान-विज्ञान योग

सत, रज, तामस गुण से प्रेरित, उत्पन्न भाव जो भी होते,

अभिव्यक्त शक्ति मेरी करते मेरे बिन वे न प्रगट होते।

इस तरह रहा यों सब कुछ मैं, फिर भी माया गुणों से अतीत,

आधीन किसी के हुआ नहीं, मैं हूँ स्वतंत्र मैं हूँ अजीत।-12

 

सम्पूर्ण जगत मायाश्रित ये सत, रज, तम के अधीन रहा,

गुणमय भावों से मोहित जग, गुण के प्रभाव के साथ बहा।

मैं परे गुणों से रहा पार्थ, मुझको न जगत यह जान सके,

अविनाशी है मेरा स्वरूप, मोहित न मुझे पहिचान सके।-13

 

त्रिगुणात्मक यह मेरी माया, यह मेरी दैविक शक्ति रही,

निश्चय ही यह अति दुस्तर है आसान न इससे मुक्ति रही।

माया से जो आच्छादित मन, वह मुक्त नहीं होने पाता,

लेकिन शरणागत हुआ जीव, माया-बन्धन से तर जाता।-14

आते वे मेरी शरण नहीं, माया ने जिनका ज्ञान हरा,

हो गई आसुरी वृत्ति और, जिनने अपना स्वभाव बदला।

वे मूढ़ दुष्कृति पापात्मा, रहते प्रवृत्त दुष्कर्मों में

वे रहे नराधन उन सबकी, रूचि रहती नहीं स्वधर्मो में।-15

 

इन पापात्माओं से हटकर, पुण्यात्मा भी होते अर्जुन,

जो करते हैं मेरी सेवा, मुझसे जो जोड़े रखते मन।

वे आर्त ग्रस्त जो विपदा से, अथार्थी, धन के अभिलाषी

जिज्ञासु, पिपासु ज्ञान के जो, ज्ञानी, कि तत्व के अन्वेषी।-16

 

भजते सकाम मुझको जो जन, वे विषयासक्ति दोष तजकर,

कालान्तर में बनते ज्ञानी, निस्पृह रहकर मुझसे जुड़कर

इन सब में भक्ति योग द्वारा, ज्ञानी जो मुझसे युक्त श्रेष्ठ

मैं प्रिय उसका वह मुझको प्रिय, चारों में ज्ञानी सर्वश्रेष्ठ।-17   क्रमशः…