श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 79 वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 79 वी कड़ी.. 

नौवां अध्याय : राजविद्या-राजगुह्य योग

वेदोक्त कर्मकाण्डी पण्डित, वे सोमपान करने वाले,

निष्पाप स्वर्ग की प्राप्ति हेतु, कर यजन मुझे भजने वाले।

वे यज्ञ देव के आराधक, मुझको परोक्ष में पूज रहे,

पुण्यात्मा स्वर्ग लोक पाकर, सुख देवलोक के भोग रहे।-20

 

स्वर्गीय विषय सुख भोगो से, संचित पुण्यों का क्षय होता,

चुक जाते जिस दिन पुण्य सभी, फिर मृत्यु लोक में आ गिरता।

इस तरह प्राप्तक्षण भंगुर सुख, जो कर्मकाण्ड से वे पाते,

हो जाता है जिस दिन पूरा, वे फिर भव बन्धन में आते।-21

 

रख श्रद्धा भक्ति भाव मुझमें, मेरे स्वरूप का कर चिन्तन,

नित भजते रहते हैं मुझको, तल्लीन किये जो मुझमें मन।

हे अर्जुन ऐसे भक्तों को, मिलता है मेरा संरक्षण,

नित उनके योगक्षेम का मैं, करता रहता हूँ स्वयं वहन।-22

 

अन्यान्य देवताओं की जो, कर रहे उपासना यज्ञों से,

अभिलाषा फल की लिये हुए, जो भक्ति भाव से श्रद्धा से।

कर रहे उपासना मेरी ही, कौन्तेय न वह विधि सम्मत है,

फल मिलता है उनको लेकिन, वह नहीं पूर्णतः सार्थक है।-23

 

सच तो यह है मैं ही वह हूँ, जो परमेश्वर जो है, अद्वेय,

भोक्ता इन सारे यज्ञों का, अविनाशी है जो है अव्यय।

मेरा यह दिव्य स्वरूप इसे, वे नहीं तत्व से, जान सके,

इसलिये न मुक्ति मिली उनको, वे पुनर्जन्म को प्राप्त रहे।-24   क्रमशः…