श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 77 वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 77 वी कड़ी.. 

नौवां अध्याय : राजविद्या-राजगुह्य योग

श्री भगवानुवाच :-

सक्रिय मेरी अपरा माया, सम्पूर्ण चराचर को रचती,

अध्यक्ष बना रहता हूँ मैं, यह अपना कार्य किया करती।

इसके कारण ही बार-बार होता रहता है सृष्टि सृजन,

इसके कारण ही होता है संहार, सृष्टि का हे अर्जुन।-10

 

अवतार ग्रहण जब मैं करता, मानव शरीर करता धारण,

ईश्वर कैसे मानव होगा, शंका का मैं बनता कारण।

उपहास मूर्ख करते मेरा, मुझको न असाधारण मानें,

मैं परमेश्वर मेरा स्वभाव हे दिव्य, नहीं इसको माने।-11

 

इस तरह रहे सम्मोहित जो, वे रहे अनीश्वरवादी ही,

हो गया आसुरी मन उनका, वे बनते रहे विवादी ही।

हो सकें मुक्त यह नहीं हुआ, उनके न कर्म फिर सुधर सके,

जो अर्जित ज्ञान हुआ उनको, उनका सब कुछ निष्फल निकले।-12

 

लेकिन हे पार्थ महात्माजन, जो दिव्य प्रकृति में वास करें,

जो माया के अधीन नहीं,, जो मोह विरत मुझको सुमरे।

यह मान कि मैं हूँ आदि पुरुष, अविनाशी हूँ, भजते मुझको,

कर देता हूँ अविलम्ब मुक्त, जग की माया से मैं उनको।-13

 

ये नित्य-निरन्तर मेरा ही, करते रहते हैं संकीर्तन,

चेष्टायें भक्ति भाव पूरित, दृढ़ निश्चय से करते महिमन।

करके प्रणाम वे आराधना-पूजन वंदन अर्पण करते,

ये रहे महात्मा जन ऐसे, जो अपना लक्ष्य पूर्ण करते।-14   क्रमशः…