श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 76 वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 76 वी कड़ी.. 

नौवां अध्याय : राजविद्या-राजगुह्य योग

श्री भगवानुवाच :-

मैं सर्वव्यापत सब कुछ मुझमें, फिर भी मैं हूँ अर्जुन असंग,

मेरा यह योगैश्वर रूप देख जिसके आगे है विश्व दंग।

पाते हैं जन्म भरण पोषण, मुझसे सम्पूर्ण जीवधारी,

लेकिन सुन उनमें नहीं रही, आत्मा मेरी यह अविकारी।-5

 

ज्यो नित्याकाश रहा उसमें, सब ओर संचरित वायु रहा,

त्यों सकल प्राणियों का मुझमें, जीता हँसता संचार रहा।

इच्छा से सृष्टि सृजित होती, उसका लालन पालन होता,

पर जाती अन्त एक दिन वह, पर मैं सबसे असंग होता।-6

 

जब आता है कल्पान्त समय, सम्पूर्ण सृष्टि लय हो जाती,

मेरी ही प्राकृत प्रकृति रही, उसमें ही यह सब खो जाती।

फिर नये कल्प के उद्भव पर, रचता हूँ मैं संसार नया,

मेरी ही शक्ति रही जिससे, फिर सृष्टि बनी फिर जगत सधा।-7

 

सम्पूर्ण सृष्टि आधीन रही, मेरी इच्छा से बने मिटे,

इच्छा करता तो बस जाती, इच्छा करता तो सृष्टि मिटे।

अपरा में पुनि पुनि कर प्रवेश, मैं बार-बार यह सृष्टि रचूँ

वह शक्ति औचित्य रही अर्जुन, फिर भी मैं परम असंग रहूँ।-8

 

मैं करता हूँ जो कार्य पार्थ, वे मुझे नहीं बन्धनकारी,

इसलिये कि मैं ज्यों उदासीन, गतियाँ चलती रहती सारी।

प्राकृत क्रिया की शक्ति अलग, सम्पादित अपना काम करे,

मैं होकर भी हूँ अनासक्त जब जग जीवन व्यापार चले।-9   क्रमशः…