श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 73 वी कड़ी.. 

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता  का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।
इस दिशा में डॉ. बुधौलिया ने स्तुत्य कार्य किया। गीता का छंदमय हिंदी अनुवाद प्रस्तुत करके वह हिंदी साहित्य को दरअसल एक धरोहर सौंप गए।
आज वह हमारे बीच डॉ. बुधोलिया सशरीर भले नहीं हैं, लेकिन उनकी यह अमर कृति योगों युगों तक हिंदी साहित्य के पाठकों को अनुप्राणित करती रहेगी ! उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला श्रीकृष्णार्जुन संवाद धारावाहिक की 73 वी कड़ी.. 

आठवाँ अध्याय : अक्षर-ब्रह्म योग

यह जीव समूह वही रहता, फिर फिर दिन में दिखलाई दे,

जब आये रात छिपे फिर फिर, दिन में फिर वही दिखाई दे।

होकर विलीन अव्यक्त रहे, कोटिक वर्षों का अन्तराल,

कर्मानुसार हों व्यक्त पुनः फिर अपना पृथक शरीर धार।-19

 

जड़ प्रकृति व्यक्त-अव्यक्त रही, इसमें होता नित परिवर्तन,

इसके ऊपर है प्रकृति एक, जिसका स्वरूप रहता चेतन।

संसार नष्ट होता लेकिन, उसका होता अवसान नहीं,

वह अविकारी, वह नित्य रही, अविनाशी का क्या अन्त कभी।-20

वह पराशक्ति है दिव्य नित्य, अक्षर कहलाता परम धाम,

अव्यक्त वही परमोच्च गति, वह परम पुरुष का परम धाम।

जाये जो वहाँ न आये फिर, संसार छूट उससे जाता,

जो परम धाम को पहुँच गया, वह नहीं लौट जग में आता।-21

 

वे परम पुरुष भगवान पार्थ मिलते, अनन्य जब भक्ति रहे,

बसते हैं परमधाम में वे, फिर भी वे सर्वत्र बसे।

वे वयाप्त सकल जड़ चेतन में, उनमें ही निहित विश्व सारा,

आधारभूत वे मूल रहे, ब्रह्माण्ड सकल जिसने धरा।-22

 

हे अर्जुन अब मैं बतलाऊँ, उन दो कालो की बात तुझे,

जो मुक्ति दिलाये या रोकें, यह बात रही क्या बात तुझे।

वह काल कि जब जग से प्रयाण, तो फिर से हो जग में आना,

अरू काल गमन जिसमें जब हो, तो फिर न रहे आना जाना।-23

 

जब महाप्रवासी के पथ में, हों अग्नि देवता अभिमानी,

दिन का अभिमानी देव सूर्य, हो शुक्ल पक्ष शशि अभिमानी।

षटमास उत्तरायण के सुर, अभिमानी हो जब देह तजे,

सहयोग मिले इन देवों का ब्रह्मज्ञ पुरुष को ब्रह्म मिले।-24   क्रमशः…