परतला हाउसिंग प्रोजेक्ट मामले में जवाबदेही पर सवाल तेज — गड़बड़ी करने वाले अधिकारी सुरक्षित, बेघर हितग्राही परेशान
छिंदवाड़ा // परतला हाउसिंग प्रोजेक्ट को संचालनालय द्वारा डी-स्कोप किए जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर इस करोड़ों के प्रोजेक्ट को फेल करने वाले अधिकारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? सात साल से जिन हितग्राहियों को मकान मिलने का इंतजार कराया गया, उनकी जिंदगी अधर में लटका दी गई, लेकिन गलती करने वाले तंत्र के जिम्मेदार लोग आज भी पूरी तरह सुरक्षित हैं।
सिस्टम की गलती, सजा जनता को — जिम्मेदार कौन ?
यह स्वीकार किया जा चुका है कि प्रोजेक्ट संचालन में गंभीर त्रुटियां हुईं, वित्तीय और तकनीकी अनियमितताएं सामने आईं। फिर भी एक भी अधिकारी दोषी नहीं ठहराया गया, किसी पर न अनुशासनात्मक कार्रवाई, न निलंबन, न जवाबदेही तय। इसका सीधा अर्थ यही है कि गलतियां मान ली गईं, लेकिन गुनाहगार बचा लिए गए।
सात साल का इंतजार… खाली ढांचा और टूटी उम्मीदें
23 मकानों का सपना दिखाकर हितग्राहियों से उम्मीदें जगाई गईं। निर्माण शुरू हुआ, पैसा लगा, ढांचा खड़ा हुआ और फिर अचानक फाइलों में उलझाकर प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब तीन महीने बाद राशि लौटाने की बात कही जा रही है, लेकिन सवाल यह है—
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क्या सात साल की मानसिक, सामाजिक और आर्थिक क्षति का हिसाब कौन देगा ?
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क्या सिर्फ राशि लौटाने से सरकार की जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी ?
किस विभाग ने की गलती — क्यों छुपाई जा रही रिपोर्ट ?
पूरा प्रोजेक्ट किस स्तर पर बिगड़ा, किस अधिकारी ने लापरवाही की, किस स्तर पर निर्णय गलत हुए—यह सब स्पष्ट होने के बजाय फाइलें बंद कर दी गईं। यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े करती है।
ऊंचे पद, बड़ी जिम्मेदारी — फिर भी चुप्पी क्यों ?
मामला सार्वजनिक, निर्माण अधूरा, हितग्राही परेशान… फिर भी उच्च प्रशासनिक जिम्मेदारों की चुप्पी सवालों से ज्यादा गहरी दिख रही है।
चुप्पी से कहीं ऐसा तो नहीं कि
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गलती मानकर भी दोषी बचाए जा रहे हैं?
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तंत्र भीतर ही भीतर गड़बड़ी पर परदा डाल रहा है?
लोगों की मांग — नाम सार्वजनिक हों, कार्रवाई हो
पीड़ित हितग्राहियों और जागरूक नागरिकों की स्पष्ट मांग है—
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गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के नाम सार्वजनिक किए जाएं
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विभागीय जांच खुली तरीके से की जाए
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दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो
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हितग्राहियों को सिर्फ पैसा नहीं, न्याय भी दिया जाए
यह मामला केवल एक अधूरे प्रोजेक्ट का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और शासन के भरोसे का विषय बन चुका है। अब देखना यह है कि क्या शासन उन अधिकारियों तक हाथ डालने का साहस दिखाता है जिन्होंने सपनों का मकान छीनकर फाइलों का महज “क्लोज केस” बना दिया… या मामला यूं ही दबा दिया जाएगा।