अस्पताल में मरी इंसानियत या बेटी थी.. इसलिए मार दी ?
फिर शर्मसार हुई इंसानियत ..
त्वरित टिप्पणी : राकेश प्रजापति
परासिया सिविल अस्पताल के टॉयलेट में फंसी एक नवजात बच्ची का शव केवल एक खबर नहीं है, यह आधुनिक समाज के चेहरे पर पड़ा वह बदनुमा धब्बा है, जो तमाम विकास, कानून और नारों के बावजूद आज भी मिट नहीं पाया। जिस जगह को जीवन बचाने का मंदिर कहा जाता है, वहीं एक नन्ही जान को सबूत मिटाने के लिए कमोड में बहाने की कोशिश—यह दृश्य नहीं, हमारी सामूहिक संवेदना की निर्मम हत्या है।
सबसे अधिक पीड़ा इस आशंका से होती है कि यह सब केवल इसलिए किया गया क्योंकि वह बच्ची थी।
नौ महीने तक जिस देह में जीवन पलता रहा, उसी देह से जन्म लेते ही उस जीवन को समाज के डर, लिंगभेद और क्रूर सोच के हवाले कर दिया गया। ममता, जिसे ईश्वर का सबसे पवित्र रूप कहा जाता है, यहां भय और अमानवीयता के नीचे दम तोड़ती दिखी।
यह घटना सवाल खड़े करती है—
क्या हमने सच में बेटियों को स्वीकार करना सीखा है ?
क्या ‘बेटी बचाओ’ सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित रह गया है ?
और क्या हमारी सामाजिक संरचना आज भी मां को इतना असहाय बना देती है कि वह अपने ही बच्चे की हत्यारिन बन जाए ?
यह केवल एक “निर्दयी मां” की कहानी नहीं है, यह उस समाज की कहानी है जो आज भी लड़की के जन्म को बोझ समझता है, जो डर पैदा करता है, जो अपराध को जन्म देता है।
दोष केवल एक व्यक्ति का नहीं—दोष हमारी सोच, हमारे मौन और हमारी असफल सामाजिक चेतना का भी है।
परासिया की यह नन्ही बच्ची बिना नाम, बिना अपराध, बिना मौका पाए इस दुनिया से चली गई।उसका शव नहीं, हमारी इंसानियत कमोड में फंसी मिली हैऔर सवाल यह है कि क्या हम अपनी मानसिकता बदलने की ईमानदार कोशिश करेंगे,या फिर अगली खबर का इंतज़ार करेंगे ?
आज ज़रूरत है सिर्फ जांच और गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की—
वरना हर ऐसी खबर के साथ हम थोड़ा-थोड़ा इंसान होना खोते चले जाएंगे।