मप्र में 1.15 लाख शिक्षक पद रिक्त, विधानसभा में खुलासा..

मध्यप्रदेश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की हकीकत विधानसभा में सामने आते ही सरकार के दावे कठघरे में आ गए। खुद शिक्षा मंत्री ने स्वीकार किया कि प्रदेश में 1 लाख 15 हजार से अधिक शिक्षक पद खाली हैं और हजारों स्कूल एक-दो शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। पिछले दो दशकों में बड़ी संख्या में स्कूल बंद या विलय होने से हालात और गंभीर हो गए हैं, जिससे लाखों बच्चों की शिक्षा पर सीधा संकट खड़ा हो गया है..

✍️  राकेश प्रजापति 

मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में स्कूल शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने आने के बाद राज्य की शिक्षा नीति और सरकारी दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल पर स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने सदन में स्वीकार किया कि प्रदेश में शिक्षकों के 1 लाख 15 हजार 678 पद रिक्त हैं, जो स्वीकृत पदों का लगभग 40 प्रतिशत है। यह आंकड़ा सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता और भविष्य को लेकर चिंताजनक स्थिति को उजागर करता है।

हर तीन में से एक पद खाली, प्राथमिक शिक्षा सबसे ज्यादा प्रभावित : सरकार के अनुसार स्कूल शिक्षा विभाग में शिक्षकों के कुल 2 लाख 89 हजार 5 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से केवल 1 लाख 74 हजार 419 पदों पर ही शिक्षक कार्यरत हैं, जबकि शेष पद खाली हैं।

विभागीय आंकड़े बताते हैं कि प्राथमिक विद्यालय: 1,33,576 पद स्वीकृत – 55,626 रिक्त ,माध्यमिक विद्यालय: 1,10,883 पद स्वीकृत – 44,546 रिक्त , उच्च माध्यमिक विद्यालय: 44,546 पद स्वीकृत – 15,506 रिक्त

इसका सीधा अर्थ है कि प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को पर्याप्त शिक्षक नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे बुनियादी शिक्षा प्रभावित हो रही है।

हजारों स्कूलों में एक या दो शिक्षक, लाखों बच्चों का भविष्य संकट में : प्रदेश के 83,514 सरकारी स्कूलों में से 1,968 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक है, जबकि 46,417 स्कूलों में मात्र दो शिक्षक ही पदस्थ हैं। एक शिक्षक वाले स्कूलों में नामांकित छात्र: 41,965 ,दो शिक्षक वाले स्कूलों में नामांकित छात्र: 13,73,270

सबसे ज्यादा एक शिक्षक वाले स्कूल धार जिले में 144 हैं। यह स्थिति बताती है कि हजारों बच्चों की शिक्षा एक या दो शिक्षकों के भरोसे चल रही है, जो शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर प्रभाव डालती है।

हजारों स्कूल जर्जर, बुनियादी सुविधाएं भी नहीं :

सदन में सरकार ने स्वीकार किया कि प्रदेश में 5,735 प्राथमिक विद्यालय जर्जर हालत में हैं। सुविधाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है:

  • 1,725 स्कूलों में बालकों के लिए शौचालय नहीं

  • 1,784 स्कूलों में बालिकाओं के लिए शौचालय नहीं

  • 75 उच्च माध्यमिक स्कूलों में बालक शौचालय नहीं

  • 43 उच्च माध्यमिक स्कूलों में बालिका शौचालय नहीं

जर्जर स्कूलों की सबसे ज्यादा संख्या झाबुआ (618) और धार (550) में है।

एक शाला एक परिसर’ और स्कूल विलय: शिक्षा तक पहुंच सीमित

सरकार ने ‘एक शाला एक परिसर’ योजना के तहत 22,973 परिसरों में 49,477 स्कूलों का विलय किया है। इसका उद्देश्य संसाधनों का बेहतर उपयोग बताया गया, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हजारों छोटे स्कूलों का अस्तित्व खत्म हो गया और बच्चों को दूर स्थित स्कूलों में जाना पड़ रहा है।

कम नामांकन का तर्क, लेकिन सवाल नीति पर

सरकार ने बताया कि 20 से कम छात्र संख्या वाले 11,889 स्कूलों में 1,48,817 छात्र और 23,873 शिक्षक हैं, यानी प्रति स्कूल औसतन 13 छात्र हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति शिक्षा व्यवस्था की कमजोरी का परिणाम है, क्योंकि जब शिक्षक नहीं होंगे, सुविधाएं नहीं होंगी, तो अभिभावक स्वाभाविक रूप से निजी स्कूलों की ओर रुख करेंगे।

20 वर्षों में हजारों सरकारी स्कूल बंद या विलय

मध्यप्रदेश में पिछले लगभग 20 वर्षों से भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान बड़े पैमाने पर सरकारी स्कूलों का विलय और बंद होना एक बड़ा मुद्दा रहा है। नीतिगत बदलावों और ‘स्कूल रेशनलाइजेशन’ के नाम पर हजारों छोटे स्कूलों को या तो बंद कर दिया गया या बड़े स्कूलों में मिला दिया गया। इससे ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा तक पहुंच कठिन हो गई।

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • स्कूल बंद होने से ड्रॉपआउट दर बढ़ी

  • गरीब और ग्रामीण बच्चों की शिक्षा सबसे ज्यादा प्रभावित हुई

  • निजी स्कूलों पर निर्भरता बढ़ी

  • सरकारी शिक्षा व्यवस्था कमजोर हुई

सरकार का जवाब: भर्ती जारी, अतिथि शिक्षकों से काम चलाएंगे

शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने कहा कि शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया जारी है और आगे भी भर्ती की जाएगी। उन्होंने कहा कि जहां आवश्यकता होगी, वहां अतिथि शिक्षकों के माध्यम से व्यवस्था की जाएगी।

सरकारी स्कूलों की हालत क्यों बिगड़ी ?

मध्यप्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति कई नीतिगत और प्रशासनिक कारणों का परिणाम है:

  1. नियमित भर्ती का अभाव ,

  2. स्कूलों का विलय और बंद होना

  3. बुनियादी सुविधाओं की कमी

  4. निजी स्कूलों को अप्रत्यक्ष बढ़ावा

  5. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा पर कम ध्यान

शिक्षा व्यवस्था सुधारना सबसे बड़ी चुनौती

सरकारी आंकड़े स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों की स्थिति गंभीर है। लाखों बच्चों का भविष्य शिक्षक की कमी, जर्जर भवन और बंद होते स्कूलों के बीच फंसा हुआ है।

यदि जल्द व्यापक भर्ती, आधारभूत सुविधाओं का विकास और स्कूलों के पुनर्जीवन की नीति नहीं अपनाई गई, तो सरकारी शिक्षा व्यवस्था और कमजोर हो सकती है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।