रोशनी देने का दावा करने वाले खुद अंधेरे के सौदागर निकले..

विशेष रिपोर्ट: ‘मानवता का सौदा’ या सिस्टम की मूक सहमति ? छिंदवाड़ा का वो ‘अंधेर’ जो रूह कंपा दे..

यह एक अत्यंत गंभीर और विचलित करने वाली खबर है। एक प्रतिष्ठित कहे जाने वाले संस्थान पर ‘अंग तस्करी’ और ‘अवैध नेत्र प्रत्यारोपण’ जैसे आरोप लगना न केवल स्वास्थ्य विभाग की विफलता है, बल्कि जिला प्रशासन की कार्यशैली पर भी एक बड़ा कलंक है। एक सामाजिक कार्यकर्ता (रिंकू रितेश चौरसिया) को RTI से सबूत जुटाकर जनसुनवाई में आना पड़ता है, तब जाकर सिस्टम जागता है।

✍️ राकेश प्रजापति

छिंदवाड़ा// जिला मुख्यालय की जनसुनवाई में जो खुलासा हुआ है, वह केवल एक अस्पताल की अनियमितता नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के ‘निकम्मेपन’ का खुला दस्तावेज है। परासिया के लायंस आई हॉस्पिटल पर अंग तस्करी और अवैध नेत्र प्रत्यारोपण के सनसनीखेज आरोप बताते हैं कि कैसे रक्षक ही भक्षक बने बैठे हैं और प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ है।

स्वास्थ्य विभाग: ‘सफ़ेद कोट’ के पीछे छिपा भ्रष्टाचार ?

जानकारी के मुताबिक यह संस्थान लगभग 25 वर्षों से बिना वैधानिक अनुमति के नेत्र निष्कर्षण (Eye Extraction) कर रहा था। यहाँ स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर सीधे और कड़े सवाल खड़े होते हैं:

निरीक्षण का ढोंग: क्या 25 सालों में एक बार भी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय को यह सुध नहीं आई कि उनके जिले में अंग प्रत्यारोपण का खेल चल रहा है?

THOTA अधिनियम की धज्जियां: जब संस्था के पास ‘मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम 1994’ के तहत पंजीकरण ही नहीं था, तो स्वास्थ्य अमला उसे फलने-फूलने की अनुमति कैसे दे रहा था? यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि विभागीय मिलीभगत की ओर इशारा करता है।

फर्जीवाड़े की परंपरा: 2025 में भी इसी संस्था पर ‘राष्ट्रीय अंधत्व निवारण मिशन’ में फर्जी बिलों के जरिए गबन का आरोप लगा था। इसके बावजूद कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई, जिससे इनके हौसले बुलंद हुए।

प्रशासनिक अधिकारियों की ‘अपराधिक अनभिज्ञता’

जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के नाक के नीचे इतना बड़ा सिंडिकेट चल रहा था और उन्हें खबर तक नहीं थी ? यह ‘अनभिज्ञता’ अपने आप में एक अपराध है।

जनसुनवाई का इंतजार क्यों ? एक सामाजिक कार्यकर्ता (रिंकू रितेश चौरसिया) को RTI से सबूत जुटाकर जनसुनवाई में आना पड़ता है, तब जाकर सिस्टम जागता है। सवाल यह है कि प्रशासन की अपनी खुफिया एजेंसियां और निगरानी तंत्र क्या केवल फाइलों में बंद हैं ?

बिना पुलिस के ‘आंखों का खेल’: रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में एक मृतक की आंखें बिना पुलिस या विशेषज्ञ डॉक्टर की मौजूदगी में, एक निजी कंपाउंडर ने निकाल लीं। क्या प्रशासन इतना लाचार है कि अस्पताल में जो मर्जी आए वो हो जाए और किसी को जवाबदेही न देनी पड़े ?

भोपाल से दिल्ली तक के तार: एक बड़ा नेटवर्क

यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर (PMO, NOTTO, मानव अधिकार आयोग) तक पहुंच चुका है। भोपाल समेत अन्य शहरों से जुड़ी कड़ियां इस बात की पुष्टि करती हैं कि यह कोई छोटी-मोटी चूक नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित ‘अंग तस्करी नेटवर्क’ है? जिसे स्थानीय स्तर पर संरक्षण प्राप्त था।

किसका संरक्षण, किसका फायदा ?

अस्पताल द्वारा नेत्रदान का प्रमाणपत्र तो जारी किया गया, लेकिन वैधानिक रिकॉर्ड पेश नहीं किए जा सके। यह साबित करता है कि दान की आड़ में अंगों का सौदा किया जा रहा था। क्या जिला स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी इन फाइलों को दबाने के लिए ‘कमीशन’ का स्वाद चख रहे थे ?

अब केवल जांच नहीं, सजा चाहिए

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और NOTTO के हस्तक्षेप के बाद अब प्रशासन की बोलती बंद है। लेकिन क्या मुख्य सचिव के निर्देश के बाद भी स्थानीय अधिकारियों पर गाज गिरेगी ? छिंदवाड़ा की जनता यह पूछ रही है कि जो अधिकारी 25 साल तक इस ‘अंधेरगर्दी’ को नहीं देख पाए, क्या उन्हें पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार है ?

यह मामला स्वास्थ्य जगत का ‘ब्लैक होल’ है। यदि अब भी संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों और लापरवाह प्रशासनिक अमले पर कठोर FIR दर्ज नहीं होती, तो यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था खुद इन तस्करों के साथ खड़ी है।

“आंखें दान करने वालों ने पुण्य सोचा था, लेकिन सिस्टम ने उसे व्यापार बना दिया।”

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