सरकार ने स्वीकारा: प्रदेश में 25.95 लाख बेरोजगार युवा ..

मप्र का ‘बेरोजगारी’ डेटा: आंकड़े कम, चुनौतियां ज्यादा ?

विशेष डेस्क : ख़बरद्वार

मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों ‘रोजगार’ शब्द सबसे अधिक गूंज रहा है।विधानसभा के बजट सत्र 2026 के तीसरे दिन सरकार ने जो आंकड़े पटल पर रखे, उन्होंने न केवल सत्तापक्ष के दावों की परीक्षा ली, बल्कि विपक्ष को एक धारदार हथियार भी थमा दिया है। प्रदेश के रोजगार पोर्टल पर दर्ज 25 लाख 95 हजार युवाओं का नाम केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक सुलगता हुआ सामाजिक-आर्थिक सत्य है।

आंकड़ों का सामाजिक और शैक्षणिक आईनासरकार द्वारा प्रस्तुत डेटा के अनुसार, बेरोजगारी का यह बोझ किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। सामाजिक समीकरणों पर नजर डालें तो स्थिति और भी गंभीर नजर आती है:

पिछड़ा वर्ग (OBC): 10.50 लाख युवा (कुल का ~40%)।

सामान्य वर्ग: 6.50 लाख युवा (कुल का 25%)।

SC/ST वर्ग: लगभग 9 लाख युवा। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकांश युवा ‘शिक्षित’ हैं। 12वीं पास और स्नातकों की यह बड़ी संख्या संकेत देती है कि प्रदेश में डिग्रियां तो बंट रही हैं, लेकिन वे बाजार की जरूरतों (Job Market) के अनुरूप ‘हुनर’ देने में विफल रही हैं।

तुलनात्मक विश्लेषण: 2021 बनाम 2026 : सरकार का तर्क है कि 2021 के अंत तक पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या 30.23 लाख थी, जो अब घटकर 25.95 लाख रह गई है। सरकारी तंत्र इसे अपनी ‘सफलता’ बता रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कमी सरकारी नौकरियों के प्रति युवाओं के टूटते मोह या निजी क्षेत्र में ‘अल्प-वेतन’ वाली अस्थायी नौकरियों की मजबूरी का भी परिणाम हो सकती है।

राष्ट्रीय परिदृश्य और मध्यप्रदेश का स्थान : राष्ट्रीय स्तर पर तुलना करने पर मध्यप्रदेश की स्थिति विरोधाभासी दिखती है। हरियाणा (जहाँ बेरोजगारी दर अक्सर दो अंकों में रहती है) या राजस्थान के मुकाबले मप्र की बेरोजगारी दर तकनीकी रूप से कम (1.5% – 2%) दर्ज की जाती है।

लेकिन समस्या यहाँ ‘बेरोजगारी दर’ की नहीं, बल्कि ‘गुणवत्तापूर्ण रोजगार’ की है। 25 लाख युवाओं का ‘आकांक्षी’ (Aspirational) श्रेणी में होना यह दर्शाता है कि वे केवल काम नहीं, बल्कि अपनी योग्यता के अनुरूप सम्मानजनक काम ढूंढ रहे हैं।

विपक्ष का प्रहार: “आंकड़ों की बाजीगरी”

सदन में कांग्रेस विधायक प्रताप सिंह ग्रेवाल के सवाल पर सरकार को घेरते हुए विपक्ष ने तीखे सवाल किए। विपक्ष के तीन प्रमुख आरोप रहे..

मनरेगा की विफलता: ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिन का काम सुनिश्चित करने में सरकार का पिछड़ापन।

भर्ती परीक्षाओं का अकाल: पटवारी और अन्य लंबित भर्ती प्रक्रियाओं के कारण युवाओं का भविष्य अधर में।

पंजीकरण का भ्रम: विपक्ष का दावा है कि लाखों युवा हताश होकर पंजीकरण कराना छोड़ चुके हैं, इसलिए संख्या कम दिख रही है।

विशेषज्ञ मत और भविष्य की राह

आर्थिक विश्लेषक मत : “मध्यप्रदेश को ‘स्किल गैप’ भरने पर ध्यान देना होगा। 33 लाख करोड़ के निवेश के दावे कागजों से निकलकर जब तक जमीन पर नहीं उतरते, तब तक यह 25 लाख का आंकड़ा कम नहीं होगा।”

मुख्य बिंदु : OBC वर्ग सर्वाधिक प्रभावित: साढ़े 10 लाख युवा रोजगार की तलाश में , शिक्षित बेरोजगारों की फौज: स्नातकों की संख्या 6 लाख के पार, 2021 से अब तक: पंजीकरण में 4.28 लाख की मामूली गिरावट।

संपादकीय दृष्टिकोणमध्यप्रदेश की ‘युवा शक्ति’ आज दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ औद्योगिक निवेश के सुनहरे सपने हैं, तो दूसरी तरफ पोर्टल पर दर्ज लाखों नामों की लंबी कतार। बजट 2026 में श्रम विभाग के लिए आवंटित 1,335 करोड़ रुपये  का बजट स्वागत योग्य है, लेकिन इसकी सफलता केवल इस बात पर टिकी है कि यह बजट कितने युवाओं के हाथों को हुनर और काम दे पाता है।