क्या शिक्षा माफिया के आगे घुटने टेक चुकी है मध्य प्रदेश सरकार ? 22 लाख ‘लापता‘ छात्रों के पीछे का सुनियोजित षड्यंत्र….
कल्पना कीजिए, अगर किसी प्रदेश की आबादी से अचानक एक पूरा का पूरा शहर गायब हो जाए, तो क्या सत्ता के गलियारों में खामोशी रह सकती है ? मध्य प्रदेश में ठीक ऐसा ही हुआ है—फर्क सिर्फ इतना है कि गायब होने वाले ईंट-पत्थर के मकान नहीं, बल्कि 22 लाख मासूम बच्चों का भविष्य है। यह सिर्फ विधानसभा के पटल पर रखा गया कोई सूखा आंकड़ा नहीं है; यह उस खौफनाक और सुनियोजित साजिश का जीता-जागता प्रमाण है, जिसमें एक चुनी हुई सरकार ने शिक्षा माफिया के आगे पूरी तरह घुटने टेक दिए हैं। पिछले एक दशक में सरकारी स्कूलों को जानबूझकर उस ‘वेंटिलेटर’ पर ला खड़ा किया गया है, जहां से उनकी मौत तय है। मकसद बिल्कुल साफ है—सरकारी शिक्षा व्यवस्था को इतनी खामोशी और बेदर्दी से मार दिया जाए कि भविष्य में सरकार इस पूरी जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ ले और शिक्षा को पूरी तरह निजी हाथों की जागीर बना दे। हमारा मकसद इस खबर को सिर्फ आप तक पहुँचाना भर नहीं है, बल्कि पूरी जिम्मेदारी के साथ उस स्याह षड्यंत्र को परत-दर-परत समझाना है कि कैसे ‘सुशासन’ के शोर-शराबे के बीच प्रदेश की एक पूरी पीढ़ी को अनपढ़ और मजदूर बनाने की खौफनाक पटकथा लिखी जा चुकी है।
“ राकेश प्रजापति “
पिछले एक दशक में मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों से 22 लाख से अधिक बच्चे गायब हो गए। क्या यह महज एक प्रशासनिक विफलता है, या फिर सरकारी शिक्षा को खत्म कर उसे पूरी तरह निजी माफियाओं के हवाले करने की एक खौफनाक पटकथा ?
मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था अब सिर्फ चरमराई नहीं है, बल्कि पूरी तरह से ढह चुकी है। यह कोई राजनीतिक अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर स्वीकार की गई वह कड़वी सच्चाई है जो प्रदेश के भविष्य पर एक बदनुमा दाग है। पिछले 10 सालों (2015-16 से 2024-25) के आंकड़ों पर गौर करें तो कक्षा 1 से 12वीं तक के नामांकन में 22.03 लाख बच्चों की भयानक कमी दर्ज की गई है। सवाल यह है कि ये 22 लाख बच्चे कहां गए ? क्या वे आसमान में निगल लिए गए या धरती में समा गए ? या फिर शिक्षा माफिया और सरकार के गठजोड़ ने इन नौनिहालों के भविष्य की बलि चढ़ा दी है ?
‘सुशासन’ के दावों की खुली पोल और संस्थान की रहस्यमयी चुप्पी स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने सदन में कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल के सवाल के जवाब में इन आंकड़ों को खुद स्वीकार किया है। लेकिन इस समूचे घटनाक्रम का सबसे शर्मनाक पहलू सरकार का वह रवैया है, जो कुशासन को ‘सुशासन’ के आवरण में छिपाने की कोशिश कर रहा है।
इस भयावह गिरावट की जांच के लिए शिक्षा विभाग ने 8 मई 2025 को ‘अटल बिहारी सुशासन संस्थान’ को पत्र लिखा था। रिमाइंडर पर रिमाइंडर भेजे गए, 10 महीने का लंबा वक्त बीत गया, लेकिन संस्थान ने आज तक न तो कोई कार्ययोजना पेश की और न ही कोई रिपोर्ट। यह सिर्फ शिक्षा विभाग की नाकामी नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि सरकार कागजों पर जांच का दिखावा कर समय काट रही है, ताकि असल दोषियों तक आंच न पहुंचे।
क्या यह शिक्षा व्यवस्था को नीलाम करने की पृष्ठभूमि है ? सरकारी स्कूलों में छात्रों की यह गिरावट कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह एक ‘सुनियोजित षड्यंत्र’ का हिस्सा प्रतीत होती है। प्रदेश में शिक्षा माफिया इतना रसूखदार हो चुका है कि उसके हितों को साधने के लिए सरकारी स्कूलों को जानबूझकर ‘वेंटीलेटर’ पर रखा जा रहा है।
- शिक्षकों का अकाल: प्रदेश में शिक्षकों के 1 लाख 15 हजार से ज्यादा पद खाली पड़े हैं।
- जर्जर बुनियादी ढांचा: हजारों स्कूल 20 से कम छात्रों के साथ चल रहे हैं, जिनकी इमारतें जीर्ण-शीर्ण हैं।
- सुविधाओं का टोटा: मिड-डे-मील की लचर व्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं का अभाव।
क्या सरकार जानबूझकर ऐसा माहौल तैयार कर रही है जिससे आम जनता का भरोसा सरकारी स्कूलों से पूरी तरह उठ जाए? जब स्कूल में शिक्षक नहीं होंगे, छत टपक रही होगी और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण भोजन नहीं मिलेगा, तो मजबूर होकर गरीब से गरीब माता-पिता भी कर्ज लेकर अपने बच्चों को निजी स्कूलों में धकेलेंगे। जो ऐसा नहीं कर पाते, उनके बच्चे बाल मजदूरी या खेती में झोंक दिए जाते हैं। यह स्पष्ट इशारा है कि सरकार भविष्य में शिक्षा जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विभाग से अपना पल्ला झाड़कर इसे पूरी तरह कॉरपोरेट और निजी हाथों में सौंपने की पृष्ठभूमि तैयार कर रही है।
घोटालों की गूंज और मौन साधे बैठी सरकार सरकार हर साल शिक्षा के बजट में वृद्धि के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह पैसा शिक्षा के उन्नयन के बजाय भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। विपक्ष द्वारा हजारों करोड़ के घोटाले के जो आरोप लगाए जा रहे हैं—जिनमें फर्जी नामांकन, आंकड़ों की बाजीगरी और मिड-डे-मील फंड की बंदरबांट शामिल है—वे इसी माफिया तंत्र की ओर इशारा करते हैं। इसके बावजूद सरकार की चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि सत्ता तंत्र माफिया के सामने नतमस्तक है।
समय आ गया है जवाबदेही का प्रदेश की भाजपा सरकार को अब यह साफ करना होगा कि सुशासन का उनका पैमाना क्या है? अगर व्यवस्था में थोड़ी भी पारदर्शिता बची है, तो इस पूरे प्रकरण की तत्काल सीबीआई (CBI) जांच होनी चाहिए और शिक्षा की स्थिति पर एक श्वेत पत्र (White Paper) जारी किया जाना चाहिए।
अब समय केवल विधानसभा में सवाल पूछने का नहीं रह गया है; यह समय है सड़क पर उतरकर आक्रोश जताने का। मध्य प्रदेश के गरीब बच्चों की शिक्षा को मुनाफे की मंडी में तब्दील करने वाले शिक्षा माफियाओं और उनके राजनीतिक संरक्षकों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। जब तक इस साजिश का पर्दाफाश नहीं होता, तब तक यह माना जाएगा कि यह सरकार शिक्षा को ‘अधिकार’ से बदलकर एक ‘लक्जरी’ कमोडिटी बनाने के अभियान पर काम कर रही है।
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