‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..41

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।

उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 41 वी कड़ी ..

तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’

             ‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’

श्लोक (३०)

हे अर्जुन चेतस बनकर तुम, परमात्मा को सब कुछ समझो,

तुम हो निमित्त परमात्मा के, हर हालत में ऐसा समझो।

उसको ही पूर्ण समर्पित हो, पूरे अपने कर्तव्य करो,

आशा ममता सन्ताप रहित, तुम उठो पार्थ बस युद्ध करो।

 

तुम अर्पित कर दो मुझे सभी, अपने कृत कर्तव्यों के फल,

ले धनुष साथ रथ पर बैठो, तत्पर तुमसे लड़ने कुरु दल ।

दुर्योधन जैसे दुष्टों का, जो भार धरा पर, करो दूर,

महिमा स्वधर्म की रक्षित हो, कर्तव्य तुम्हारा यही शूर ।

श्लोक (३१)

अर्जुन कर्त्तव्य-कर्म अपने, जो मुझे समर्पित करते हैं,

जो दोष दृष्टि से रहित पुरुष, मुझमें दृढ श्रद्धा रखते हैं ।

चलते हैं जो मेरे मत से उनको न कर्म बन्धन बनते,

वे श्रद्धावन्त मुक्त होते, अनुसरण कि जो मेरा करते ।

श्लोक (३२)

लेकिन मनुष्य जो करते हैं, मुझमें दोषारोपण अर्जुन,

मेरे मत के अनुरूप नहीं, चलते जो वे पाले विभ्रम ।

विपरीत बुद्धि के धारक वे, हर भाँति पतित हो जाते हैं,

कुछ नहीं लोक में कर पाते अपना परलोक मिटाते हैं ।

 

स्वीकार करें मेरा मत, आदरपूर्वक श्रद्धालु पुरुष,

अरु करें आचरण तदनुकूल, वे हो जाते हैं कर्मरहित ।

अन्यथा देह के पाश उन्हें बाँधे रखते हैं बन्धन में,

जो तिरस्कार कर मन्त्रों का, चाहा करते सुख जीवन में।

 

मेरे मन्त्रों की हँसी उड़ाते हैं जो जन वाचाल बने,

वे विषयी विष से ग्रस्त रहे, वे मोह-पंक में रहे सने ।

ज्यों व्यर्थ रत्न हो जाता है, हाथों में रहा प्रेत के जो,

दिखता है उसे प्रकाश नहीं, आँखों से अन्धा होता जो ।

 

ज्यों झरती सुधा ज्योत्स्ना की, कौए के काम नहीं आती,

महिमा त्यों मेरे मन्त्रों की, यह नहीं मूर्ख को दिख पाती ।

विश्वास नहीं करता है वह, विपरीत चाल वह सदा चले,

वह आत्म घात करता अपना, क्या औंधा घट भी कभी भरे?

श्लोक (३३)

संवाहक रही प्रकृति सबकी, परवश स्वभाव के रहे सभी,

जो कर्म किए जाते सब वे, संचालित रहे प्रकृति से ही ।

जन्मों जन्मों के कर्मों का, फल प्रगट प्रकृति में होता है,

जैसी मनुष्य की प्रकृति रही, वैसे वह कर्म सँजोता है ।

 

वश चलता नहीं किसी का भी, सब काम प्रकृति करवाती है,

स्वेच्छाचारी की टेक नहीं, उसके आगे चल पाती है।

ज्ञानी जन की सब चेष्टायें, अनुसार प्रकृति के चलती हैं,

जो विमल रहे, विक्षेप रहित, जो नहीं आवरण रखती हैं।

 

अर्जुन, जो मनुज विचारवान, गोचर से करे न लाड़-प्यार,

क्या खेल साँप के साथ उचित, या होना केहरि पर सवार ?

क्या विष का प्राशन उचित रहा, क्या उचित आग के रहे खेल?

धोखे से भी यदि भड़क गई, तो कौन लगा पाता नकेल?

 

जो लाड़ इन्द्रियों का करता विषयोपभोग के लिए करे,

तन रहा प्रकृति के पराधीन, वह बात नहीं ऐसी समझे

केवल शरीर के लिए सदा, अपने करता व्यवहार सभी,

क्या रहा धर्म तन जीवन का, जाता न ध्यान इस ओर कभी।

 

विषयों का सेवन सुख देता, यह वैसे ही सच लगता है,

ज्यों चोर बना साथी पथ का, अवसर पाकर ही ठगता है।

पथ पर चलता है साथ साथ, आता जंगल आघात करे,

बचनाग स्वाद में मीठी पर, खाने पर जन का प्राण हरे ।

 

परिणाम प्राणघातक होता, चारे के पीछे काँटा है,

हाथी होता है बुद्धिमान, पर गड्ढे में गिर जाता है ।

जिस तरह शिकारी घेर-घेर कर मृग को एक जगह लाते,

यह रहा विषय का सुख, जिसके लालच में मृगवत फँस जाते ।

 

जो काम इन्द्रियों में बसता ले जाता सुख की ओर वही,

जब मछली फँसती काँटें में बन जाता है दुर्दान्त वही ।

विषयों के सुख की अभिलाषा क्रोधाग्नि तीव्र कर जाती है,

जब तक न भस्म सब कर देती वह शान्त नहीं हो पाती है।

 

घातक है काम-क्रोध जानो, तुम कभी न इनका साथ करो,

मत आत्मज्ञान से विमुख बनो, विषयों के सुख में नहीं पड़ो ।

सुधि करो न मन में विषयों की, यह बीमारी हैं, इसे तजो,

मत पड़ो भुलावे में इनके, विषयों के छल से बचो बचो । क्रमशः…