‘गीता ज्ञानप्रभा ‘ धारावाहिक 223 ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 223 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’

‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (१३-१४)

कारण हैं पाँच महाबाहो, सब कर्मो की जो पूर्ति करें,

बतलाता जिन्हें सांख्य दर्शन, अर्जुन इस तरह उन्हें समझें ।

आधार कर्म का अधिष्ठान, होता शरीर, कर्त्ता प्राणी,

इन्द्रियाँ करण, बहु चेष्टाएँ, अरु प्रेरक प्रभु अन्तर्यामी ।

 

तन से मन से अरु वाणी से, करता है कर्म मनुज जो भी,

अनुकूल धर्म के हों अथवा, विपरीत धर्म के रहें सभी ।

जुड़ते हैं कारण पाँच उक्त, तब पूर्ण कर्म होने पाता,

यदि हेतु नहीं होते पूरे, तब कर्म अधूरा रह जाता ।

 

सब कर्मो को करने अर्जुन, आवश्यक हैं उपकरण पाँच,

जिनको वेदांत बताता है, जिन पर कसकर तू कर्म जाँच ।

पहिला है कार्यस्थान इसे, कह सकते तन या अधिष्ठान,

कर्त्ता साधन फिर चेष्टाएँ, अरु भाग्य रहे ये उपादान ।

 

इन पाँच कारणों में से कर्त्ता-केवल कारण एक रहा,

कहता है साँख्य पुरुष जिसको, या आत्मा जिसको कहा गया।

यों आत्मा रहा अकर्ता पर, वह साक्षी बनकर रहता है,

कर शुरु प्रकृति की गतिविधियाँ, निर्धारक कारण बनता है।

 

तन के भीतर जो प्राण शक्तियाँ, करती रहतीं क्रियाएँ,

उनको ही चेष्टा कहा गया, उनसे ही कर्म दिशा पाएँ ।

है तत्व अमानवीय कोई, जिसको देवम् या भाग्य कहो,

जो बाधक या साधक होता, जिसके आगे परतन्त्र रहो

 

वह बुद्धिमान संकल्प रहा, संकल्प सर्वदर्शी प्रधान,

जिससे है जग यह क्रियाशील, यह तत्व अलख लेकिन महान ।

हो सके नहीं इसकी व्याख्या, यह मानवीय गति का प्रेरक,

संयोग, भाग्य, प्रारब्ध कहो, या दैव, शक्ति का जो धारक ।

 

तालाब समय का है जिसमें, छोड़ा करता कंकड़ मनुष्य,

उठती हैं जो तल पर लहरें, उनको न देख पाता मनुष्य ।

बोएँ हम बीज, फसल लेकिन, हमको न मिले यह संभव है,

पर फसल उच्चतर हाथों में संरक्षित है, यह निश्चय है।

 

यह नियति मानवोत्तर जग की, आवश्यकता अनिवार्य रही,

ब्रह्माण्ड भरी गतिविधियों को, जो अलख रही पर धार रही।

पहिले हो चुका घटित जितना, उसका ही यह परिणाम कहो।

अपने में किए समाहित है, उस सारे परिणामी जग को ।

 

शासन करती सारे जग पर, यह अखिल भुवन की शक्ति बनी,

इसके अगणित उद्देश्य रहे, यह उर-अन्तस में रहे बसी ।

यह करती रहे कार्य अपना, इस पर न किसी का वश चलता,

विश्वास भाग्य में करना यों रे नहीं सहेजना निष्क्रियता ।

 

निष्क्रियता का आधार नहीं, विश्वास दैव का बन जाए,

संक्रमण दशा जिसमें मनुष्य, दैवीय लक्ष्य वह अपनाए ।

लौकिक पाशविक आनुवंशिकता, ऊपर उठने का यत्न करे,

परिवेश शुद्ध कर उन्नति का, मन में अदम्य संकल्प धरे ।

 

मानव जीवन में प्रकृति पुरुष, इन दोनों का संयोग रहा,

यह दशा संक्रमण की इसमें, हो हंस समान विवेक जगा ।

वह प्राकृत गुण से ऊपर उठ, अपने सात्विक गुण को पाए,

आवश्यक उसको रहा कि सच्चा त्याग, उसे वह अपनाए ।

 

आत्मा असंग रहती अर्जुन, यह कर्म न कोई करती है,

कर्मो के पाँच अन्य कारण, यह केवल हलचल लखती है।

पहिला कारण होता शरीर, इसमें ही भोग-विषय सारे,

भोक्ता भी इसमें रहता है, विषयों के रहे विविध द्वारे ।

 

है ठौर जीव का यह शरीर, चौबीस तत्व का यह निवास,

सुख-दुख का भान कराए यह, इन्द्रिय गुण के इसमें विकार ।

कहलाता है यह अधिष्ठान, बन्धन या मुक्ति सुलभ करता,

यह जागृत स्वप्न सुषुप्ति दशा-इन तीनों को धारण करता ।

 

जो कारण रहा दूसरा वह, कहलाता है कर्त्ता, अर्जुन,

प्रतिबिम्ब चेतना का है वह, चैतन्य देह वह जाता बन ।

‘मैं ही हूँ देह’ कहा करता, उसको ही जीव कहा जाता,

कर्मो का कर्त्ता बने जीव, वह तन से अलग न रह पाता ।

 

कहता है प्रकृति नहीं, सारे कर्मो का हूँ मैं ही कर्ता,

जीवात्मा यह मोहाच्छन्न, कर्मो का कर्त्ता बन जाता ।

उसकी ही रही चेतना जो इन्द्रिय द्वारों से फैल रही,

आकृति जो विषय वासना की, वह उसके दर्पण में उभरी ।

 

हे नृपनन्दन इन्द्रियाँ विभिन्न, मानव की है तृतीय कारण,

रहती है बुद्धि एक लेकिन, कितने ही रुप करे धारण ।

इन्द्रियाँ बुद्धि को भावित कर, उसमें विभिन्नता उपजातीं,

किरणें प्रकाश की अलग-अलग, खिड़की से अलग नजर आतीं।

 

रे क्रिया शक्ति राजस गुण की, जो प्राणवायु बनकर रहती,

वह है अखण्ड पर अलग-अलग अंगों में अलग प्रगट होती।

आती है जब वह वाचा में, वह बोल रही होती वाणी,

पैरों में जब सक्रिय होती, चलने-फिरने लगता प्राणी ।

 

वह नाभिकमल से हृदय तलक, रे प्राणवायु कहलाती है,

ऊपर प्रवेश जब करती है, तब वह उदान हो जाती है।

जब अधोद्वार से निकले वह, कहलाने लगती वह अपान,

सारे शरीर में व्याप्त ब्यान, वह नाभि केन्द्र पर है समान ।

 

भोजन का रस सारे शरीर में पहुंचाती है वही वायु,

कोने-कोने में सब शरीर के, सक्रिय रहती वही वायु ।

व्यवहार भेद से, इसी वायु को, कहते हैं समान वायु,

है क्रिया शक्ति, कर्त्तत्त्व एक, है मूल रुप में एक वायु ।

 

अर्जुन अन्तस की वृत्ति बुद्धि, इन्द्रियाँ जिसे उकसाती है,

देती है बुद्धि दिशा उनको, या खुद भावित हो जाती है।

रे प्रबल इन्द्रियों का प्रभाव, उनके विषयों का असर पड़े,

हो वशीभूत उनके प्राणी, अपने स्वाभाविक कर्म करे ।

 

चेष्टाएँ हैं चतुर्थ कारण, जो क्रियाशक्ति के रुप रहे,

व्यवहार भेद के कारण ये, नाना रुपों में हैं प्रगटे ।

झपकाते हैं अपनी पलकें, अथवा डकार हम लेते हैं,

आती है छींक जम्हाई या, बहु भाँति क्रिया हम करते हैं।

 

चेष्टाएँ करते हैं अनेक, चाहा करते कृति में सुधार,

वाणी में हो उत्तम कवित्व, कविता में हो रस का निखार ।

संगति हो प्राप्त रसिक जन की, परमार्थ तत्व कृति में आए,

पूरी हो बात, दूसरी को, पूरी करने मन अकुलाए ।

 

नेत्रों में शक्ति सूर्य की ज्यों, सब देवों का तन में निवास,

उनके बल पर करने पाता, है जीव सफल अपने प्रयास ।

देवों के मण्डल के प्रकाश से, संचालित सारा जीवन,

अर्जुन कहते हैं, दैव जिसे, वह होता है पंचम कारण । क्रमशः…