रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।
श्लोक (११)
सम्पूर्ण रुप से त्याग नहीं, कर्मो का कोई कर सकता,
यह देहबद्ध है जीव पार्थ, जो कर्मो से बन्धकर चलता ।
अतएव त्याग के केवल फल का, कर पाने का वह अधिकारी,
कर्मो का नहीं, त्याग फल का, फल का त्यागी सच्चा त्यागी।
कोई भी तनधारी प्राणी, अपने सब कर्मो को त्यागे,
यह रहा असंभव कार्य पार्थ, तन उसका कर्मो से बाँधे ।
हाँ, त्याग एक कर सकता है, फल त्याग कहा जाता जिसको,
फल त्याग किया जिस त्यागी ने, सच्चा त्यागी कहते उसको ।
बिन कर्म किए कोई मनुष्य, रह सके न यह सम्भव अर्जुन,
निर्वाह नहीं तन का होगा, रुक जायेगा जीवन का क्रम ।
इसलिए कर्म का नहीं, कर्म के फल का, त्याग किया जाता,
जो करता त्याग कर्मफल का, वह सच्चा त्यागी कहलाता ।
श्लोक (१२)
कर्मों के फल का त्याग नहीं, कर पाते जो वे बन्ध जाते,
सुख-दुख या दोनों का मिश्रण, जीवों के बाँटे में आते ।
ये तीन कर्मफल होते हैं, मरने पर जीव जिन्हें पाता,
पर जिसने फल का त्याग किया, वह सुख-दुख में न उलझ पाता ।
फल अच्छा, बुरा कि मिला हुआ, हर प्राणी मरने पर पाता,
उसका बनता प्रारब्ध वही, जब नया जन्म लेकर आता ।
पर फल का त्याग किया जिसने, वह नहीं कर्म फल पाये,
वह जीते जी, वह मरकर भी, बन्धन से सदा मुक्ति पाये
सुख भोग दिलाय पुण्य कम, दुख भोग पाप कर्मो का फल,
सुख-दुख दोनों का मिश्रण भी, पाता है प्राणी अलग-अलग ।
जन्मों-जन्मों यह क्रम चलता, पर त्यागी जो निष्काम रहे,
शुभ अशुभ कर्म के फल उसके, फल त्याग भावना साथ जले।
प्रारब्ध कर्म, क्रियमाण कर्म सब उस त्यागी के जल जाते,
जो करते अपने कर्म मगर, निष्काम भाव जो अपनाते ।
त्यागी के कर्म बीजवत है, जो भुंज पुन्सत्व गंवा देते,
होते न अंकुरित या फलते, वे नहीं कार्य-कारण बनते ।
चलता रहता है कर्म-भोग, इसका न अन्त होने पाता,
फल एक भोगता हुआ मनुज, उत्पन्न नये करता जाता ।
इस पार कहो, उस पार कहो, नौका आती जाती रहती,
तरु शाखा झरती बीज नये, नित नई पौध बढ़ती जाती ।
चलता रहता संसार चक्र, जीवों का क्रम चलता रहता,
पर नहीं चक्र में वह फंसता, जो कर्म-फलों को तज रहता ।
गिर गई जहाँ दीवार वहाँ, फिर कहाँ भित्ति के चित्र रहे ?
जब मूल स्वरुप न शेष रहा, फिर उसकी छाया कहाँ मिले ?
संपूर्ण कर्म ही जीव साथ, उसके शरीर के साथ रहा,
जीव जीवित तब रहता ही है, पर मृत्यु बाद भी साथ रहा।
परित्याग कर्म के फल का हो, है मार्ग मुक्ति का एक मात्र,
फिर रहे न भोग को कर्मशेष, हो जाता है निःशेष गात्र । क्रमशः….