‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक .. 59

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 59 वी कड़ी ..

षष्ठोऽध्यायः – ‘आत्म संयम योग’ अध्याय छः- ‘सच्चा योग और कर्म एक है’

श्लोक (६)

जीवात्मा ने,जिसने मन को, इन्द्रियों सहित तन को जीता,

वह मित्र स्वयं का बन जाता उसने सारे जग को जीता ।

लेकिन जो जीत नहीं पाया, मन, बुद्धि,इन्द्रियों को,तन को,

उसका आत्मा बन जाता है, उसका ही परम शत्रु उसको ।

 

जिसने निम्नस्तर आत्मा को उच्चस्तर आत्मा से जीता,

उसकी आत्मा बन गई मित्र उसने ऊपर उठना सीखा ।

पा नहीं सका उच्चस्तर जो, अपनी आत्मा का रहा दीन,

आत्मा ही बनी शत्रु उसकी करवाती उसका मुख मलीन ।

 

मन श्रेष्ठ बन्धु बनता उसका जिसके वशवर्ती रहता मन,

मन परम शत्रु उसका बनता, वशवर्ती रहा न जिसके मन ।

मन हेतु मुक्ति का बनता है,या बनता बन्धन का कारण,

उर में परिनिष्ठित प्रभु होते, मन करता आज्ञा का पालन ।

 

करके विचार हम अहंकार को त्याग ब्रह्म को पा जाते,

कर लेते निज कल्याण स्वयं या तन में लुब्ध उलझ जाते ।

विस्मृत करते अपना स्वरूप, रेशम के कीट समान बने,

अपने द्वारा निर्मित अपने ही कोष खोल में स्वयं बँधे ।

श्लोक (७)

हो जिसका अन्तःकरण शान्त, वृत्तियाँ शान्त जिसके मन की,

मानापमान सर्दी गर्मी, सुख-दुख में जो समान रहतीं ।

स्वाधीन आत्मावाला वह परमात्मा में सम्यक बसता,

परमात्मा के अतिरिक्त ज्ञान में उसके अन्य न कुछ रमता

 

अपनी निचली आत्मा को जीते, कर ले आत्म प्रभुत्व प्राप्त,

उपलब्ध शान्ति को हो जाए, सर्वोच्च शिखर पर हो निवास ।

आत्मा समाधि में स्थित हो रहता है द्वन्द्वातीत पार्थ,

धृति, शान्ति अचल, विक्षुब्ध नहीं करने पाता कोई पदार्थ ।

 

‘अपना मन जिसने जीत लिया, वह पाता मन की शान्ति प्रथम,

फिर पूर्ण रूप परमात्मा का अवधारित करता उसका मन ।

ऐसे जन को समरूप हुए, जग के सुख-दुख, या शीतघाम,

द्वंद्वों का होता शमन सहज, होते समान मानापमान ।

श्लोक (८)

हो जिसका अन्तःकरण तृप्त, विज्ञान-ज्ञान से भरा हुआ,

इन्द्रियाँ विजित जिसकी सारी जिसका विकार निशेष हुआ ।

जिसको समान मिट्टी सोना, वह भगवत प्राप्त हुआ योगी,

समभाव रखे, सम बुद्धि रखे, कहते हैं उसे सिद्ध योगी ।

 

विज्ञान-ज्ञान से तृप्त पुरुष, पाता कृतार्थता अविचलता,

साक्षात्कार करता अपना, वह ज्ञानी योगी कहलाता ।

वह ब्रह्म तत्व में बसा हुआ, सबमें समता का भाव रखे,

ऐसा जितेन्द्रिय मिट्टी को, पत्थर सोने को सम समझे ।

 

जिसने अपना मन जीत लिया अरु शान्त वासनाएँ कर लीं,

परमात्मा से अपनी दूरी साधन कर जिसने कम कर ली ।

तपकर निर्दोष हुए कंचन में चमक स्वयं ही आ जाती,

साधक, योगी के उर अन्तर में ब्रह्म-भावना भर जाती

 

घट फूटे तो जो घटाकाश, वह महाकाश का पा जाता,

वह महाकाश को पाने को, रे, नहीं कहीं बाहर जाता ।

तज दिया देह का अहंकार तो पार्थ हुआ अवरोध दूर,

भाषित हो जाता परमात्मा, जीवात्मा का जो रहा मूल ।

 

वह सहज जितेन्द्रिय हो जाता, परमात्मा पाता ज्ञानी,

छोटा या बड़ा न भेद करता, सब पर समभाव रखे ज्ञानी ।

विक्षुब्ध नहीं होता है, वह घटने वाली घटनाओं से,

वह राग-द्वेष के परे रहा, सम्बन्धों के अनुबन्धों से । क्रमशः…