‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..38

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।

उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 38 वी कड़ी ..

तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’

             ‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’

श्लोक (१८)

रहता है नहीं प्रयोजन कुछ, कर्मों के करने से उसका,

कर्मों के ना करने से भी, कुछ नहीं प्रयोजन हो जिसका ।

सम्पूर्ण प्राणियों से जिसका, किंचित न स्वार्थ-सम्बन्ध रहा,

वह प्राप्त हुआ परमात्मा को, जीवन उसका कृत कृत्य रहा ।

 

जिस तरह तृप्त हो भोजन से, साधन समाप्त हो जाते हैं,

जब आत्मरूप सुख मिल जाता, सुख के साधन चुक जाते हैं।

निःशेष कर्म हो जाता है, सच्चे सुख के सध जाने पर,

त्यों रुके आचरण साधन का, बस परम तत्त्व के पाने पर ।

श्लोक (१९)

जब तक न प्राप्त परमात्मा हो, करना होता है कर्म, पार्थ,

आसक्ति रहित कर्मों से ही, सधता है जीवन का यथार्थ ।

इसलिए कि रहकर अनासक्त, जो कर्म करे प्रभुको पाये,

जनकादि मुक्ति जिनने पाई, वे अपने कर्मों से पाए ।

 

हे अर्जुन, तुझसे कहता हूँ, तू भी अपना कर्तव्य निभा,

आसक्ति रहित होकर तू भी, पालन करने स्वधर्म डट जा ।

श्लोक (२०)

अनुकूल वर्ण, आश्रम, स्वभाव, अरु रहे परिस्थिति के वे ही,

कर्तव्य कर्म कहलाते हैं, करणीय कर्म होते वे ही ।

जो काय कर्म परधर्म कर्म अथवा निषिद्ध जो कर्म रहे,

उनमें जो उलझा रहा मनुज, जीवन क्षण उसके व्यर्थ बहे ।

 

यदि कर्म-सजगता नहीं रही, तो खोट कभी भी आ सकता,

त्रुटिपूर्ण कर्म करने वाला रे, श्रेयस कभी न पा सकता ।

इसलिए आचरण भली भाँति, कर्तव्य कर्म का करना है,

प्रस्तुत करना आदर्श, लोक को जिसके पीछे चलना है ।

 

हे अर्जुन, नहीं जनक जैसों ने, किया कर्म का त्याग मगर,

वे जीवन मुक्त रहे जग में, निष्काम कर्म सम्पादित कर ।

कर्त्तव्य लोक संग्रह का भी, आदर्श दिखाकर पूर्ण किया,

अनुकरण लोक करता उसका, जो कर्मयोग के साथ जिया ।

 

होकर कृतार्थ निष्काम हुओं पर भी कर्तव्य शेष रहता,

उपकार अन्य लोगों का हो, वह ऐसा पथ निर्मित करता ।

अन्धों के बीच आँख वाला ज्यों राह दिखाता चलता है,

अज्ञानी जन को ज्ञानी जन, त्यों दीपक बनकर जलता है।

 

व्यवहार धर्मपालन उसका, देता चलता है संस्कार,

यात्रा को उनकी करे सुगम, जिनको करना है नदी पार |

यह राह लोक संग्रह की भी, चलना होती है साधक को,

जिसने साधा है कर्मयोग, उस एकाकी आराधक को ।

श्लोक (२१)

ज्ञानी को अपने लिए नहीं कर्त्तव्य शेष कोई रहते,

पर उसके किये कर्म सारे, लोकार्थ लोकहित में रहते ।

आचरण करे जो श्रेष्ठ पुरुष, वैसा ही करते अन्य लोग,

जो प्रामाणिक वह कर देता, उस पर चलते हैं अन्य लोग ।

 

अच्छे गुण धारक, माननीय, धर्मात्मा जो व्यवहार करें,

ज़ग की उन पर श्रद्धा उपजे, उन पर जन गण विश्वास करें ।

यदि श्रेष्ठ पुरुष विचलित होते, अस्थिर हो रहे व्यवस्था भी,

टूटे न धर्म की कड़ी कहीं, दायित्व रहा यह उनपर भी।

 

जिस तरह बर्तते श्रेष्ठ पुरुष, जग उसको धर्म समझता है,

वह देख आचरण श्रेष्ठों का, उसका ही पालन करता है।

 

यह स्वाभाविक है इसीलिये कर्मों का त्याग न उचित रहा,

साधू सन्तों के लिए आचरण का सविशेष महत्व रहा ।

इसलिए कि पालन कर स्वधर्म, सिद्धों ने लीक बनाई है,

जिसपर चलकर दुनिया अपना, कल्याण साधती आई है। क्रमशः…