मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद
किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 37वी कड़ी ..
तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’
‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’
श्लोक (१३)
पर पंचयज्ञ सम्पादित कर, जो अन्न बचे उसको खाये,
होता वह साधक श्रेष्ठ पुरुष, वह मुक्त पाप से हो जाये ।
लेकिन वह पापी रहा, मात्र निज को जो अन्न पकाता है,
बिन दिए अग्नि में आहूति जो, पापान्न सभी खा जाता है ।
देखो जग के सब कार्य सुचारु चलें, हो जीवों का पोषण,
सहयोग परस्पर हो सबका, हो नहीं किसी का भी शोषण ।
वे देव रहे वे रिषी रहे, वे पितर, मनुष्य, जीवधारी,
ये पाँच सृष्टि के पाये हैं, जिन पर है सधी सृष्टि सारी ।
इन सबमे सांमजस्य रहे, सब अपनी उन्नति कर पायें,
इच्छाएं पूरी करें देव, सत्कर्म मनुज गण अपनायें
इन सबके अपने कार्य रहे, जो जीवन के क्रम को साधें,
मानव सबका उत्तरदायी सुख-दुख में वह सबसे आगे ।
वह ब्रह्म यज्ञ, रिषि यज्ञ करे, कर देव यज्ञ वह करे हवन,
कर पितृयज्ञ वह श्राद्ध करे, वह करे पितरगण को तर्पण ।
वह मनुष-यज्ञ सम्पन्न करे, गुरु अतिथिदेव की सेवा कर,
अरु भूत यज्ञ वह करें सदा, जीवों को अन्न-भाग देकर 1
जीवों को सुख पहुँचाने से ही, होता है सार्थक जीवन,
यज्ञादि कर्म करने से ही निष्पाप, बने मानव का मन ।
जीवन-यापन को शेष अन्न का सेवन, ध्येय रहा जिसको,
नैमित्तिक होती हिंसा का, फिर पाप नहीं लगता उसको ।
पर पाप सना भोजन करता, जो बिना होम के खाता है,
संग्रह करता है पापों का, वह उनसे मुक्ति न पाता है ।
केवल शरीर का पोषण ही, अरु भोग मात्र, जीवन जिसका,
हो पाता नही ‘अमृताशी’, ‘पापिष्ठ ‘रहा भोजन उसका ।
अमृत का सेवन करने से, ज्यों महारोग मिट जाते हैं,
त्यों यज्ञ-शेष के सेवन से, सब पाप दूर हो जाते हैं।
सामग्री रही हवन की सब, सम्पत्ति किया जिसका अर्जन,
पालन स्वधर्म का यज्ञ रहा, जिसमें होता उसका अर्पण ।
जो यज्ञ-शेष को ग्रहण करे, निर्वाह करे जो जीवन का .
पापों से पाता छुटकारा, जीवन उसका निर्मल बनता ।
श्लोक (१४,१५)
होते हैं सिद्ध यज्ञ जिससे, ईश्वर प्रसन्न जिससे होता,
वह अन्न ब्रह्म का रूप रहा, वह अन्न न साधारण होता ।
अग जग का जीवन अन्न रहा, आधार रहा वह प्राणों का,
उससे उत्पत्ति प्राणियों की, वह भरण और पोषण करता ।
उत्पन्न अन्न से प्राणिमात्र, पर्जन्य अन्न उत्पन्न करे,
बरसे पर्जन्य सुधा बनकर, जो वैश्नावर बलि से जन्मे ।
यज्ञों के कर्म विहित होते, निर्धारित करते उन्हें वेद,
जो जनक रहे सब कर्मों के, परमात्मा के जो रूप वेद ।
यह रहे सुरक्षित सृष्टि- चक्र, इसलिए यज्ञ अनिवार्य रहे,
ब्रह्मा से शुरू हुआ जो क्रम, वह चले सतत, कल्पान्त चले।
उत्पत्ति, वृद्धि, पोषण का होता, हेतु अन्न, अन्यान्य नहीं,
है ब्रह्म वेद, है व्रत यज्ञ, परमात्मा इनसे अलग नहीं ।
श्लोक (१६,१७)
यह यज्ञ स्वधर्म का पालन है, इसका जो करता उल्लंघन,
अथवा कर्तव्य नहीं करता, या पैदा करता है व्यतिक्रम ।
या सृष्टि चक्र के चलता है अनुकूल नहीं जो बुद्धिहीन,
या भोग वासना में ही रहता, लिप्त सदा जो मन मलीन ।
उसका जीवन है व्यर्थ, पुरुष, पापायु, भार बनकर जीता,
जैसे बकरी की गर्दन में सुखा हो कोई स्तन, लटका ।
इसलिए कि करे उपेक्षा जो कर्तव्य कर्म की जीवन,
वह बाधित करता सृष्टिचक्र बन भार व्यर्थ जीता जग में।
लेकिन जो मनुष्य आत्मा में करता है रमण, तृप्त रहता,
आत्मा में ही सन्तुष्ट रहे, कर्तव्य न कुछ उसको रहता ।
चलते रहते हैं देह-धर्म, पर कर्म-संग से बँधा नहीं,
ऐसा कोई क्षण नहीं रहा, जब आत्मा के सँग जगा नहीं । क्रमशः…