मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद
किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 34 वी कड़ी ..
तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’
‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’
श्लोक (५)
इसमें सन्देह नहीं अर्जुन, यह किसी काल में हुआ नहीं,
क्षण मात्र किये बिन कर्म मनुज, इस अवनीतल पर रहा नहीं।
करना ही पड़ते कर्म उसे, प्राकृत गुण उससे करवाते,
समुदाय मनुज के कर्म किए बिन, नहीं कभी भी रह पाते।
जब तक माया का साथ जुड़ा, उसके गुण से सब कार्य जुड़े,
अज्ञानी है वह कर्म छोड़ने की, जो थोथी बात कहे ।
जो कर्म विहित उनका करना, कर्त्ता की इच्छा पर निर्भर,
पर किसी सबब से त्याग करे, कोई उनका अवरोधन कर ।
तो क्या स्वाभाविक कर्म, इन्द्रियों के उसके रुक जायेंगे?
क्या हाथ न उठने पायेंगे, क्या पैर न चलने पायेंगे?
हो जायेंगे क्या कान बन्द, क्या गन्ध न उसको आयेगी?
क्या भूख-प्यास मिट जायेगी, क्या दृष्टि नष्ट हो जायेगी?
क्या निद्रा और जागरण की, रुक जायेगी क्रिया उसकी,
संकल्प विकल्प न होंगे फिर, निष्क्रिय होगी हालत मन की?
क्या जन्म-मृत्यु का चक्र, मात्र अवरोधन से रुक जायेगा?
व्यवहार इन्द्रियों का उसकी, क्या इतने से थम जायेगा?
माया का जब तक है प्रभाव, कर्मों का त्याग नहीं होता,
रथ के अधीन होता मनुष्य, हो शान्त भले रथ में बैठा ।
रथ के हिलने डुलने की, उस पर प्रतिक्रिया होती रहती,
सूखे निष्चेष्ट पात में भी, गति ला देती बयार बहती ।
वह रहा दुराग्रह, कर्म त्याग की जो झूठी बातें करते,
गुण रहे इन्द्रियों के अपने, जो कार्य स्वयं अपने करते ।
यह रहा ढोंग निग्रह उनका, वे कर्मातीत नहीं होते,
इन्द्रिय निग्रह तो करते हैं, पर विषयों को मन में भजते ।
इसलिए कि कर्म का त्याग मात्र, निष्ठा न ज्ञान की कर पाता,
कोई मनुष्य क्षण भर को भी, क्या कभी किए बिन रह पाता ?
श्लोक (६)
हठपूर्वक दमन इन्द्रियों की, क्रियाओं का जो करते हैं,
कर दिया कर्म का त्याग, दम्भ ऐसा जो झूठा भरते हैं ।
वे हैं मिथ्याचारी, उनका मन करता विषयों का चिन्तन,
वे रहे मूढमति, करते जो रहते अपने भ्रम का पोषण ।
बाहर से कर्मों का त्यागी, भीतर विषयों का ध्यान करे,
वह मिथ्याचारी होता है, जो अपने विहित न कर्म करे । क्रमशः…