‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..33

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।

उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 33 वी कड़ी ..

 तृतीयोऽध्यायः- ‘कर्म योग’

             ‘कर्म योग या कार्य की पध्दति’

श्लोक (३)

कल्याण परम साधन निश्चित, अर्जुन को केशव बतलाते,

बहु भाँति एक ही बात प्रमुख, वे विशद रूप से समझाते

यह रहा मनुष्य के लिए उचित, वह विहित कर्म निष्पन्न करे.

वर्ण आश्रम और स्वभाव, परिस्थिति के सदैव अनुकूल चले

भगवानुवाच :-

भगवान कृष्ण बोले अर्जुन, है भ्रम की कोई बात नहीं,

जो पहिले मैंने कही बात, वह ही है तुझसे आज कही।

हैं दो प्रकार निष्ठा के, जिनको लौकिक जन हैं अपनाते,

कुछ ज्ञान मार्ग, कुछ कर्म मार्ग से साधक हैं मुझको पाते।

 

सांख्ययोग योगीजोसांख्ययोग के हैं, उनको है ज्ञान-मार्ग प्यारा,

आत्मा परमात्मा हैं अभेद, है ब्रह्म रूप जग यह सारा ।

वे ब्रह्मभूत बन जाते हैं, विभु के स्वरूप में लीन हुए,

कर्तापन के अभिमान रहित, निष्ठा में पूर्ण विलीन हुए ।

 

यह पहिली निष्ठा है जिसको, कहा गया है ज्ञान योग,

समदृष्टि प्राप्त करता योगी, अपनाता है जो ज्ञान योग ।

सम्पूर्ण जगत में आत्मा का, अपनी देखा करता प्रसार,

परमात्मा सार तत्व होता, जग सारा होता है असार ।

 

है मार्ग दूसरा योगी का, कहलाता है जो कर्म योग,

जो विहित कर्म उनका, पालन करना कहलाता कर्मयोग ।

कर्त्तव्य समझकर कामों का, अपने करता जो निष्पादन,

आशा कर्मों के फल की तज, निस्पृह रहता जिसका जीवन ।

 

फल ज्ञान योग की निष्ठा का, है तत्त्व ज्ञान परमात्मा का,

पा जाता है परमात्मा को, जो कर्मयोग को अपनाता ।

साधन है ज्ञान योगियों का, जो ज्ञानयोग को साध रहे,

अरु कर्म रहा साधन उनको, जो कर्मयोग को साध रहे ।

 

दोनों निष्ठायें हैं स्वतन्त्र, दोनों की अलग दिशायें हैं,

दोनों की हैं आकांक्षायें, दोनों की मर्यादायें हैं ।

दोनों का साधन एक साथ, कर पाना हुआ न संभव है,

इस ओर रहा निर्गुण चिन्तन, उस ओर कर्म का निष्भव है ।

 

ईशार्पित कर्म मार्ग की, जब मैंने की थी अर्जुन चर्चा,

आया प्रसंग तल ज्ञान मार्ग की, महिमा कह दी उत्कर्षो ।

तुम नहीं समझ पाये, मेरा उद्देश्य, तुम्हारी चूक हुई,

इसलिए हुई उत्पन्न, तुम्हारे मन में ऐसी भ्रान्ति नई |

 

निष्पाप पार्थ तुमसे कहता, ये मैंने मार्ग बताये हैं,

जिनको लोगों ने जीवन में, पाने मुझको अपनाये हैं

जग जड़-जंगम में चिन्तन कर, कर रहे, आचरण जीवन में,

परिचित हो ब्रह्मरूप से वे, घुल मिल जाते हैं फिर उसमें ।

 

वे रहे ब्रह्म ज्ञानी उनने, साधा होता है ज्ञान योग,

पर कर्माधारित रहा भिन्न, कहते हैं जिसको कर्मयोग ।

ज्ञानी का मार्ग कठिन होता, पर जीवन्मुक्त विचरता है,

पाने को मोक्ष कर्मयोगी, कर्मों का नियमन करता है ।

 

पूरब को बढ़े कि पश्चिम को, बह रही नदी सागर पाने,

आनन्द सिन्धु पाकर उसमें, मिल जाने मिल लय हो जाने ।

लेकिन उपासना के उपयुक्त, बनाना होता साधक को,

सम्पादित करना होती है, वांछित क्षमता आराधक को ।

 

पक्षी वृक्षों के फल को, ज्यों अपनी उड़ान से पा लेता,

पर फल पाने मनुज दूसरा, विविध यत्न क्रमश: करता ।

ज्ञानी आकाश मार्ग से, ज्यों पक्षी समान फल पा जाता,

फल वही प्राप्त करने योगी, कर्मों का नियमन अपनाता ।

श्लोक (४)

है मार्ग पिपीलिका का जैसे जो कर्मयोग का मार्ग रहा,

पाता है मोक्ष कर्म योगी जब उसको भी हो ज्ञान सधा ।

आरम्भ किए बिन कर्मों के, निष्कर्म भाव पा सके नहीं,

या त्याग मात्र कर्मों का कर निष्ठा को होता प्राप्त नहीं ।

 

कर्मों को करते हुए मनुज, रह सकता मुक्त बन्धनों से,

पा सके नहीं निष्कर्म भाव, यदि जुड़ा ‘नहीं वह कर्मों से ।

कर्मों के फल में नहीं रखे, आसक्ति वही काटे बन्धन,

पर करे नहीं जो कर्म, नहीं कटने पाते उसके बन्धन |

 

जो ज्ञान योग की सिद्धि रही, मिलती है जब अभेद सधता,

पर ज्ञानी को भी जीवन में, कर्मों को करना ही पड़ता ।

आत्मा परमात्मा भिन्न नहीं, यह बोध रहा जागृत जिसका,

वह कर्म करे पर कर्म उसे, बन्धन का कारक नहीं बनता ।

 

कोई भी हो बिन कर्म किए, जग में हो सकता नहीं सिद्ध,

करना होते हैं विहित कर्म, तजना होते हैं जो निषिद्ध ।

है नदी लबालब पानी से, हो छोर कहाँ कुछ पता नहीं,

क्या बिना नाव के, पाया जा सकता है, उसका कूल कभी?

 

क्या भूख मिटाई जा सकती है, भोजन के साधन के बिन?

पा सकता कोई सिद्धि भला, कर्मों को तज, कर्मों के बिन?

फिर कर्म छोड़ देने से, क्या हो सकता, उसका त्याग भला?

संसार खेल माया का यह, अपनी गति के आधीन चला ।

 

यह रहा घोर अज्ञान, अगर हम कर्म त्यागने का कहते,

या अपनी इच्छा बतलाते, जब किसी कर्म को तुम गहते ।

गुण कर्म इन्द्रियों के, अपने स्वाभाविक गति से चलते हैं,

हम परवश हैं, हम बाध्य हुए, अपने कर्मों को करते हैं।

 

इसलिए कि कर्म बिन किए कभी, नैष्कर्म सिद्धि मिल सकी नहीं,

निष्ठा कर्मों में आती जो, वह सिद्धि कर्म की फली नहीं । क्रमशः…