‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 233 ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 233 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (२५)

अज्ञान मोह के वशीभूत, जो कर्म किया जाता अर्जुन,

परिणाम कर्म का क्या होगा, इसका न रहे पूर्व-चिन्तन ।

भावी बन्धन, हिंसा, अनर्थ से, रहता है जिसका नाता,

स्वच्छन्द, निरंकुश, परपीड़क, वह कर्म ‘तामसी’ कहलाता ।

 

कारण जिसका अज्ञान रहे, जो कर्म विचार रहित होते,

जिनमें न हानि का हो विचार, हिंसा के ध्यान रहित होते ।

अपनी क्षमता को समझे बिन, अविवेकपूर्ण जो किए गए,

वे कर्म अहेतुक रहे पार्थ, वे कर्म तामसिक कहे गए ।

 

परिणाम दूसरों पर इनका, क्या होगा यह न विचार रहा,

वह कर्म स्वार्थ की पूर्ति हेतु, अविचार पूर्ण जो किया गया।

हिंसा कारक, पीड़ा दायक, या लूट-पाट या ठगा-ठगी,

ये कर्म तामसिक रहे पार्थ, इनसे गति कर्त्ता की बिगड़ी ।

 

काली निंदा का घर केवल, करता जो रहे निषिद्ध कर्म,

पानी पर खींचे ज्यों लकीर, समझे न कर्म का तनिक मर्म ।

यह कर्म तामसिक दुखदाई, इसका न लाभ कर्त्ता पाता,

कितना भी पेरे बालू को, क्या उससे तेल निकल पाता? ।

 

निष्फल होता है जाल पार्थ, क्या वायु जाल में फँस पाती?

होता शरीर का नाश शीघ्र दुनिया सुख की दुख बन जाती ।

नुकसान दूसरे का करते, अपना भी लाभ गंवाते हैं,

वे कर्म तामसिक निंदनीय, जो केवल पतन बढ़ाते हैं ।

 

घुस गई पेट में मक्खी जो, अपनी वह जान गंवाती है,

पर वमन दूसरा करता है, उसकी हालत बिगड़ाती है ।

क्या रही योग्यता, बल कितना, क्या भला-बुरा पाना खोना,

इसका न विचार रहे उसको, उसका है कर्म सनक ढोना

 

वह तामस कर्म रहा अर्जुन, जिससे न किसी का हित होता,

कर्त्ता को करता रहे पतित, दुख का कारण जग को होता।

रहता है वह सद्भाव शून्य, वह छुद्र स्वार्थ में लिप्त रहे,

तामस गुणधारी करे उसे, वह कर्म तामसी तमस भरे ।

 

परिणाम, हानि, हिंसा, पौरुष, का तज विचार जो कर्म करे,

सामर्थ्य भूलकर अपनी जो, कर्मों में मूढ़ प्रवृत्ति करे ।

अज्ञानी द्वारा किए कर्म, इस तरह, रहे सब अर्थहीन,

वे तामस-कर्म रहे अर्जुन, जिसके कर्त्ता की मति मलीन । क्रमशः….