रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।श्लोक (२३)
जो शास्त्र विहित कर्तव्य उचित, आसक्ति रहित जो कर्म रहा,
कर्त्तापन का अभिमान नहीं, जिसमें न द्वेष या राग रहा ।
जिसके द्वारा वह किया गया, उसको न कामना हो फल की,
वह सात्विक कर्म कहा जाता, जिससे प्रभु में निष्ठा बढ़ती ।
करना जिसको आवश्यक है, आसक्ति रहित जो किया गया,
जो राग-द्वेष से शून्य रहा, फल का न चाव जिसमें उभरा ।
वह कर्म ‘सात्विक’ कहलाता, सात्विक गुणधारी जिसे करे,
यह कर्मश्रेष्ठ होता अर्जुन, कर्ता का यह उद्धार करे ।
हिस्से में आया कर्म उसे, सन्तुष्ट भाव से ग्रहण करे,
आचरण करे वह तदनुकूल, कर्मो के फल की आश तजे ।
कर्मो का करके अनुष्ठान, ब्राह्मर्पण करे कर्म सारे,
कहलाते सात्विक कर्म इन्हें, साधक आसक्ति रहित धारे ।
होता न दुखी यदि बिगड़ गया, सम्पन्न हुआ तो खुशी नहीं,
कर्त्तापन का न गर्व जागे, मन में फल की इच्छा न रही ।
वह सहजभाव बनकर निमित्त, सम्पन्न कर्म को करता है,
यह सात्विक कर्म रहा उसको, बन्धन में नहीं जकड़ता है।
जो सात्विक विहित कर्म करता, कर्मो से नहीं लगाव रखे,
जो नहीं लालसा यह रखता, कर्मो का उसको भोग मिले ।
करना न चाहता स्वार्थ सिद्ध, आसक्ति द्वेष से मुक्त रहे,
लक्षण ये हैं उस साधक के, जो अपने सात्विक कर्म करे ।
सतगुण से, सात्विक कर्मो से, उत्पन्न ज्ञान होता अर्जुन,
राजस तामस कर्मो का फल, बन्धन कारक होता अर्जुन ।
कर्त्तव्य बुद्धि से कर्मो का, निष्पादन साधक करता है,
वह संग रहित, वह द्वेष रहित, कर्त्ता न कर्म का बनता है। क्रमशः….