‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 229..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 229 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (१९)

अर्जुन ये ज्ञान कर्म कर्त्ता, तीनों के फिर गुण-भेद रहे,

हर एक तीन गुण में बंटकर, निष्पादित अपने कर्म करे ।

कीटक से लेकर ब्रम्ह देव, सब तीन गुणों में भासित हैं ।

राजस, तामस बन्धनकारक, सात्विक गुण बस उद्धारक है।

 

त्रिगुणात्मक सारी प्रकृति रही, त्रिगुणों का जग-विस्तार रहा,

इनसे भावित हैं, ज्ञान, कर्म, कर्त्ता पर पूर्ण प्रभाव रहा ।

हो ज्ञान, कर्म अथवा कर्त्ता, प्रत्येक तीन गुण में बंटता,

गुण का निज धर्म रहा अर्जुन, जो धारक को भावित करता।

 

सत, रज, तम, गुण के भेदों का, वर्णन जो सांख्य शास्त्र करता,

साधक जो कर्मयोग का है, वह उसके प्रति आदर रखता ।

ज्ञाता अरु कर्त्ता अलग नहीं, हाँ करण, बुद्धि के भेद रहे,

हैं भेद ज्ञेय के भी अर्जुन, मन की हर शंका शास्त्र हरे ।

 

हो जाती विमल दृष्टि जिसकी, वह वस्तु-रुप पहिचान सके,

वह आत्मरुप को जान सके, परमात्मा को पहिचान सके ।

निर्मलता आती है उसको, करता जो सात्विक ज्ञान प्राप्त,

लक्षण उसके ही बतलाता, दे ध्यान उसे अब सुनो पार्थ ।

श्लोक  (२०)

वह सात्विक ज्ञान मनुज जिससे, अविभाज्य तत्व सब में देखे,

बसती है परा प्रकृति सब में, घट घटवासी प्रभु को लेखे ।

नाना विध नाना जीव रहे, नाना स्वरुप उनके विभिन्न,

सब जीवों में पर बसती है, देखे वह प्रभु-सत्ता अनन्य ।

 

अविनाशी परमात्मा बसता है, अलग अलग सब जीवों में,

समभाव विभाग रहित प्रभु को, जो देख रहा सब जीवों में।

नानाविध जग में वह देखे, परमात्मा का है एक रुप,

उसको तू सात्विक ज्ञान जान, जाना जिसने अपना स्वरुप ।

 

जिसको यथार्थ ऐसा अनुभव, वह ही सच्चा सात्विक ज्ञानी,

इसको ही पाने यत्न करे, हर पुरुष कि जो कल्याण कामी ।

इसके सिवाय सांसारिक सब, जो ज्ञान रहे वे ज्ञान नहीं,

कहलाते तो हैं ज्ञान मगर वे होते वास्तविक ज्ञान नहीं ।

 

है सच्चा सात्विक ज्ञान वही, ज्ञाता में ज्ञेय विलीन जहाँ,

सूरज क्या तम को देख सके, सरि का सागर को भान कहाँ?

अपनी छाया का कर सकता, क्या कोई आलिंगन अर्जुन,

मिट जाता चित्र हाथ से ही, जिसका स्लेट पर हो अंकन ।

 

ऐसा ही ज्ञान-प्रकाश जहाँ, त्रिपुटी न शेष रहने पाए,

जब दृश्य-वस्तुओं में बसता, परमात्म तत्व वह झलकाए ।

अपना प्रतिबिम्ब निहारे वह, जब भी देखा करता दर्पण,

जब ज्ञान ज्ञेय को देखे, उसको ज्ञाता का ही हो दर्शन ।

 

अविभक्त अनश्वर सत्ता का, जो ज्ञान करे जग में दर्शन,

वह जीवों में उसको देखे, वह करे वस्तुओं में दर्शन ।

जग के विभक्त सब रुपों में, उस एक तत्व का बोध करे,

वह ज्ञान सात्विक रहा पार्थ, ज्ञाता अरु ज्ञेय न अलग रहे । क्रमशः….