‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 227..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 227 वी कड़ी..                      अष्टादशोऽध्यायः- ‘मोक्ष सन्यास योग’
‘निष्कर्ष योग’ समस्त अध्यायों का सार संग्रह । मोक्ष के उपायभूत सांख्ययोग (सन्यास) कर्मयोग (त्याग) का अंग प्रत्यंगों सहित वर्णन ।

श्लोक  (१८)

इन्द्रियाँ प्राप्त जिसको करतीं, वह ज्ञान जहाँ थम जाता है,

या जहाँ ज्ञान का अन्त रहा, वह विषय ‘ज्ञेय’ कहलाता है।

रुक जाता बहना नदियों का, अपना पड़ाव जब पा जातीं,

पक जाती गेहूँ की बालें, तब बाढ़ पौध की रुक जाती ।

 

यह ज्ञान ‘ज्ञेय’ ‘ज्ञाता’ त्रिपुटी, कर्मों को प्रेरित करती है,

उनका बनती है, यह कारण, मन की प्रवृत्ति यह बनती है।

शब्दादि विषय जो पाँच ज्ञेय, प्रिय लगते यदि अनुकूल रहे,

ज्ञाता को वही अप्रिय लगते, यदि वे उसके प्रतिकूल रहे।

 

दिखलाता ‘ज्ञान’झलक केवल, ‘ज्ञाता’ को विषय पदार्थो की,

वे ‘ज्ञेय’पदार्थ स्वीकार रहे, या अस्वीकार मति ज्ञाता की ।

स्वीकार रहे तो वह प्रवृत्त, होता विषयों का सुख पाने,

स्वीकार नहीं तो वह प्रवृत्त होता विषयों को दुरकाने ।

 

मछली को देख झपटता है, ज्यों बगुला उसे पकड़ पाने,

या रंक खजाना देख उसे, पाने लगता है ललचाने ।

मेघों की गर्जन को सुनकर, ज्यों मोर नाचने लगता है,

त्यों ज्ञाता को जब विषय दिखे, वह उधर दौड़ने लगता है।

 

हे अर्जुन, ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञाता, यह त्रिपुटी कर्म जगाती है,

यह ही प्रवृत्ति का कारण बन, ज्ञाता से कर्म कराती है ।

यदि ज्ञेय विषय ज्ञाता को प्रिय, वह करने को उपभोग बढ़े,

यदि ज्ञेय विषय प्रिय नहीं रहा, वह उसका बढ़कर त्याग करे।

 

पा जाए हार नीलमणि का, कर ले तन पर उसको धारण,

हो ले प्रसन्न, पर पाए जब, उसने यह सर्प किया धारण ।

सारी प्रसन्नता के बदले, मन में उसके भय भर जाता,

प्रिय वस्तु वही हो गई अप्रिय, ऐसा परिवर्तन आ जाता ।

 

प्रिय को पाने होता प्रवृत्त, जो अप्रिय उसे भी दूर करे,

उसमें भी हो उसकी प्रवृत्ति, जिसके कारण वह कर्म करे ।

है मूल रुप ज्ञाता जिसका, वह विषयासक्त बने कर्त्ता,

ज्यों देव त्याग अपना आसन, मंदिर की हो रचना करता ।

 

कर्ता की दशा प्राप्त करता, दाता कर्त्ता बन जाता है,

साधन बन जाता ज्ञान उसे, जिसको प्रयोग में लाता है।

जब ज्ञेय स्वयं ही कार्य बने, गति अपनी ज्ञानी बदलता है,

त्रिगुट में कर्त्ता करण कर्म ऐसा नवीन क्रम बनता है । क्रमशः….