आज कलम थरथरा रही है… मन बोझिल है। फिर एक सामाजिक धरोहर, एक रौशनी का दीप बुझ गया।
आँखों से गिरते हर आँसू अब शब्द बनकर काग़ज़ पर बिखर रहे हैं — जैसे किसी प्रिय आत्मा की स्मृतियाँ शोकगीत बन गई हों।
कभी-कभी कुछ लोग अपने परिचय से नहीं, अपने कर्मों से अमर हो जाते हैं। फादर फ्रांसिस ऐसे ही व्यक्ति थे — सादगी की मूर्ति, करुणा के प्रतीक और शिक्षा के सच्चे साधक। संत चावरा स्कूल, चांदमेटा के प्राचार्य रहे फादर फ्रांसिस अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनकी मुस्कान और उनका ममत्व आज भी उस स्कूल की हर दीवार, हर क्यारी और हर बच्चे की आँखों में जीवित है।
वे सिर्फ़ एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि एक संवेदना थे — जो हर सुबह बच्चों के स्वागत में खिले गुलाब की तरह प्रसन्न रहते थे। उनकी आवाज़ में अपनापन था, उनके शब्दों में प्रेरणा, और उनके कर्मों में ईश्वर का साक्षात दर्शन। आधी बाँहों की सफेद शर्ट पहने, धीमे स्वर में बोलते हुए मुस्कुराते फादर फ्रांसिस की वह छवि आज भी हर किसी के मन में ताज़ा है।
कैंसर ने उनके शरीर को तोड़ दिया, पर उनकी आत्मा की रोशनी को नहीं। बीमारी की अंतिम अवस्था में भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की, बल्कि अपने छात्रों और सहकर्मियों के लिए वही प्रेरणादायक ऊर्जा बनाए रखी। जीवन के अंतिम पड़ाव तक वे अपने कर्म, समर्पण और सादगी के प्रतीक बने रहे।
संत चावरा के परिसर में उन्होंने हरियाली और प्रेम की संस्कृति बोई थी। हर पौधा, हर फूल आज भी उनके स्पर्श की गवाही देता है। वे कहते थे —
“अगर बच्चों को अच्छे इंसान बनाना है, तो उन्हें किताबों के साथ प्रकृति से भी जोड़ो।”
आज जब उस स्कूल की बगिया में कोई फूल खिलता है, तो लगता है जैसे फादर फ्रांसिस की आत्मा मुस्कुराकर कह रही हो — “मैं यहीं हूँ, तुम्हारे बीच।”
फादर फ्रांसिस का जीवन इस बात का उदाहरण है कि शिक्षक केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि आत्माओं को गढ़ता है। उन्होंने जो मूल्य दिए — विनम्रता, अनुशासन, सेवा और प्रेम — वही उनकी सबसे बड़ी विरासत हैं।
आज जब संत चावरा परिवार और पूरा परासिया क्षेत्र उनकी स्मृतियों में डूबा है, तब एक बात स्पष्ट है —
फादर फ्रांसिस भले ही शरीर से विदा हो गए हों, पर वे हर बच्चे की मुस्कान में, हर शिक्षक की प्रेरणा में, और हर फूल की खुशबू में सदा जीवित रहेंगे।
एक विनम्र श्रद्धांजलि उस संत समान शिक्षक को, जिसने जीवनभर दूसरों के रास्ते में उजाला बिखेरा।
— राकेश प्रजापति