“खेत की हरियाली से चमकी शिक्षा की लाली: सब्जी बेचकर भारी जा रही छात्रों की फीस!”
“मिट्टी से सोना और सब्जियों से शिक्षा”: जैतपुर स्कूल का क्रांतिकारी मॉडल ,जहाँ शिक्षा सिर्फ रटना नहीं, बल्कि स्वावलंबन और सेवा का पर्याय बन गई है!
क्या आपने कभी सुना है कि किसी स्कूल के गार्डन में उगी सब्जियां किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का सहारा बन जाएं ? छिंदवाड़ा के पीएम श्री शासकीय स्कूल, जैतपुर ने यह चमत्कार कर दिखाया है! यहाँ के जांबाज छात्र न केवल आधुनिक कृषि और मार्केटिंग के गुर सीख रहे हैं, बल्कि अपनी मेहनत से उगाई जैविक सब्जियों को बेचकर अपने उन साथियों की मदद कर रहे हैं, जो आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई नहीं कर पाते।
यह सिर्फ एक स्कूल नहीं, बल्कि स्वावलंबन और संवेदना की एक जीती-जागती पाठशाला है। सलाम है इन नन्हे हाथों को जो मिट्टी से ‘सोना’ और समाज के लिए ‘सहारा’ पैदा कर रहे हैं।*
“राकेश प्रजापति”
आमतौर पर ‘शिक्षा के व्यवसायीकरण’ का नाम सुनते ही हमारे मन में भारी-भरकम फीस और मुनाफे की छवि उभरती है। लेकिन मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पीएम श्री शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जैतपुर ने इस शब्द की परिभाषा ही बदल दी है। यहाँ व्यावसायिक शिक्षा का अर्थ ‘मुनाफा’ नहीं, बल्कि ‘मानवता’ है।
किचन गार्डन से ‘करुणा’ तक का सफर ..
स्कूल के विद्यार्थियों ने कृषि शिक्षक के मार्गदर्शन में स्कूल की खाली पड़ी बंजर जमीन को अपनी मेहनत से एक लहलहाते ‘किचन गार्डन’ में तब्दील कर दिया है। टमाटर, मूली, गाजर, मेथी और बैंगन जैसी जैविक सब्जियां न केवल बच्चों को खेती के गुर सिखा रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता का पाठ भी पढ़ा रही हैं।
अनोखा ‘शिक्षा-दान’: सब्जी बिकी, तो फीस भरी
इस पहल की सबसे शानदार बात इसकी अर्थव्यवस्था है। छात्र इन जैविक सब्जियों का साप्ताहिक स्टाल लगाते हैं और इन्हें शिक्षकों व ग्रामीणों को बेचते हैं।
सबसे पुनीत कार्य: इस बिक्री से जो भी धन राशि एकत्र होती है, उसे स्कूल की अलमारी में बंद नहीं किया जाता, बल्कि उससे विद्यालय के उन जरूरतमंद छात्र-छात्राओं की फीस भरी जाती है जो आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
क्यों है यह एक अनुकरणीय उदाहरण ?
यह मॉडल शिक्षा के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश करता है क्योंकि:
कौशल विकास: छात्र सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं ले रहे, बल्कि बीज बोने से लेकर विपणन (Marketing) तक का व्यावहारिक अनुभव ले रहे हैं।
सामाजिक संवेदना: बच्चों में बचपन से ही अपने साथियों की मदद करने का भाव जागृत हो रहा है।
जैविक क्रांति: रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देकर ये छात्र समाज को स्वस्थ जीवन का संदेश भी दे रहे हैं।
गुरु और शिष्य की गूँज..
विद्यालय के प्राचार्य और शिक्षकों का मानना है कि शिक्षा का असली उद्देश्य छात्र को जीवन की चुनौतियों के लिए तैयार करना और समाज के प्रति संवेदनशील बनाना है। जब एक छात्र की मेहनत दूसरे छात्र का भविष्य संवारती है, तो वह शिक्षा अपने उच्चतम शिखर पर होती है।
“जैतपुर का यह ‘ग्रीन मॉडल’ पूरे देश के स्कूलों के लिए एक प्रेरणा है। यह हमें बताता है कि अगर नीयत साफ हो और नजरिया सकारात्मक, तो स्कूल की एक छोटी सी जमीन भी शिक्षा के मंदिर को उजाले से भर सकती है।”
जिला शिक्षा अधिकारी जी एस बघेल का मानना है कि ..
“शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल साक्षरता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता है। जैतपुर स्कूल के विद्यार्थियों और शिक्षकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि नवाचार को सेवा भाव से जोड़ दिया जाए, तो संसाधनों की कमी कभी आड़े नहीं आती। स्कूल के किचन गार्डन से जरूरतमंद बच्चों की फीस भरना, ‘सच्ची शिक्षा’ का सबसे अनुपम उदाहरण है। हम जिले के अन्य स्कूलों को भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित करेंगे।”
प्राचार्य अनुूप कैचे का कहना है कि ..“हमारे विद्यालय का लक्ष्य छात्र को न केवल एक अच्छा विद्यार्थी, बल्कि एक संवेदनशील नागरिक बनाना है। जब हमने देखा कि कुछ प्रतिभावान छात्र आर्थिक तंगी के कारण अपनी फीस को लेकर चिंतित रहते हैं, तो हमने व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम से इसका समाधान खोजा। आज हमारे बच्चे खुद पसीना बहाकर अपने साथियों का भविष्य संवार रहे हैं। यह ‘कमाओ और सीखो’ की अवधारणा का एक पवित्र विस्तार है।”
कृषि शिक्षक मोहित आम्रबंसी ने बताया कि..“छात्रों को किताबी ज्ञान देना आसान है, लेकिन उन्हें मिट्टी से जोड़ना और मेहनत का मोल समझाना ही असली चुनौती थी। आज हमारे छात्र टमाटर, मेथी और अन्य सब्जियां उगाकर न केवल कृषि की बारीकियां सीख रहे हैं, बल्कि विपणन (Marketing) और प्रबंधन (Management) भी सीख रहे हैं। सबसे बड़ी खुशी तब होती है जब सब्जी बेचकर मिले पैसों से किसी गरीब बच्चे की मुस्कान वापस आती है। यह हमारे लिए फसल से कहीं बढ़कर ‘खुशहाली’ की पैदावार है।”
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