विकास या केवल ‘श्रेय’ की होड़ ? राजनीति के गिरते स्तर ..

श्रेय की ‘घटिया’ सियासत; अधूरी योजनाओं पर ‘मिट्टी’ डालने का खेल

त्वरित टिप्पणी : राकेश प्रजापति  

लोकतंत्र में विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, लेकिन छिंदवाड़ा की वर्तमान राजनीति को देखकर ऐसा लगता है जैसे विकास अब केवल ‘श्रेय’ की भेंट चढ़ चुका है। हालिया दिनों में पक्ष और विपक्ष के बीच छिड़ी जुबानी जंग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनहित अब गौण हो गया है और खुद की ‘विज्ञप्ति’ चमकाना ही प्राथमिक लक्ष्य है। एक जनप्रतिनिधि का आदर्श धर्म होता है कि वह पूर्ववर्ती द्वारा शुरू किए गए जनहित के कार्यों को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाए, न कि उन पर भ्रष्टाचार का ठप्पा लगाकर उन्हें अधर में छोड़ दे।

मेडिकल और एग्रीकल्चर कॉलेज: श्रेय की बलि चढ़ते सपने

छिंदवाड़ा की जनता के लिए एयर पोर्ट, मेडिकल कॉलेज और एग्रीकल्चर कॉलेज जैसे संस्थान केवल इमारतें नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य थे। लेकिन दुर्भाग्य देखिए, आज इन संस्थानों के अस्तित्व पर ही राजनीति की काली छाया है। एक पक्ष दावा करता है कि बजट उन्होंने स्वीकृत कराया, तो दूसरा पक्ष उसे ‘भ्रष्टाचार’ और ‘जमीन लूट’ का अड्डा बताकर खारिज कर रहा है। सच्चाई यह है कि इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच वह जनता और छात्र पिस रहा है जिसे यहाँ शिक्षा मिलनी थी। जब एक नेता दूसरे के काम पर ‘मिट्टी’ डालता है, तो वह दरअसल जनता की उम्मीदों पर मिट्टी डाल रहा होता है। क्या विकास की कोई एक्सपायरी डेट होती है जो सत्ता बदलते ही उसके महत्व को नकार दिया जाए ?

‘विज्ञप्तिवीरों’ की जहरीली जुबान और गिरता स्तर

आज की राजनीति को रसातल में ले जाने का सबसे बड़ा श्रेय उन ‘छुटभैया’ नेताओं को जाता है, जो केवल सोशल मीडिया और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित हैं। ये ‘विज्ञप्तिवीर’ अपने आकाओं की नजरों में नंबर बढ़ाने के लिए जिस तरह की जहरीली और अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, उससे जिले का सामाजिक वातावरण दूषित हो रहा है। तर्कों की जगह व्यक्तिगत हमलों ने ले ली है। राजनीति में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जिस तरह से एक-दूसरे के कार्यकाल को नीचा दिखाने के लिए ‘जहरीली शब्दावली’ का प्रयोग किया जा रहा है, वह छिंदवाड़ा की गौरवशाली राजनीतिक परंपरा के विरुद्ध है।

जनता को गुमराह करने का सुनियोजित प्रपंच

दोनों ही पक्षों की ओर से जारी किए जा रहे आंकड़े और दावे जनता को केवल भ्रमित करने का एक औजार बन गए हैं। एक तरफ ‘ऐतिहासिक विकास’ के ढोल पीटे जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ ‘पुरानी फाइलों’ को खोलकर केवल खामियां ढूंढने का काम हो रहा है। सवाल यह है कि यदि पिछली योजनाओं में कमी थी, तो उन्हें सुधारकर पूरा क्यों नहीं किया जा रहा ? श्रेय लेने की इस ‘घटिया राजनीति’ ने नेताओं को जनसेवक से बदलकर एक ‘मार्केटिंग एजेंट’ बना दिया है। श्रेय की इस अंधी दौड़ में बेरोजगारी,महंगाई ,शिक्षा, स्वास्थ्य और सिंचाई जैसे बुनियादी मुद्दे कहीं पीछे छूट गए हैं।

श्रेय नहीं, समाधान की राजनीति करें

श्रेष्ठ जनप्रतिनिधि वही है जो विकास को एक साझा विरासत माने। किसी के द्वारा शुरू किए गए अच्छे कार्य को सम्मान देना और उसे पूर्णता तक ले जाना ही एक सच्चे नेतृत्व की पहचान है। छिंदवाड़ा की जनता अब केवल ‘श्रेय के दावों’ से ऊब चुकी है; उसे धरातल पर परिणाम चाहिए। अगर नेताओं ने अपनी जहरीली जुबान और श्रेय की यह गंदी राजनीति नहीं छोड़ी, तो आने वाली पीढ़ी उन्हें केवल ‘विज्ञप्तिवीर’ के रूप में याद रखेगी, जननायक के रूप में नहीं।

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