टेसू के फूलों से महकी आदिवासी महिलाओं की किस्मत, वन विभाग की पहल लाई रंग ..
राकेश प्रजापति
जब परंपरा, प्रकृति और प्रयास का संगम होता है, तो सफलता की एक नई इबारत लिखी जाती है। छिंदवाड़ा के पूर्व वनमंडल अंतर्गत सारना क्षेत्र में कुछ ऐसा ही सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है। यहाँ की जनजातीय महिलाओं ने न केवल होली के रंगों को प्राकृतिक रूप दिया है, बल्कि अपने जीवन में भी आर्थिक स्वावलंबन के नए रंग भर दिए हैं।
वन विभाग की अनूठी पहल
वन विभाग के मार्गदर्शन में भारिया जनजाति की महिलाओं ने वन-धन विकास केंद्रों के माध्यम से एक सराहनीय कदम उठाया है। विभाग की प्रेरणा से पाँच गाँवों—सारना, झिरलिंगा, गंगई, अतरवाड़ा और रोहना—की लगभग 50 महिलाओं ने संगठित होकर प्राकृतिक ‘हर्बल गुलाल’ बनाने का बीड़ा उठाया है। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दे रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में सशक्तिकरण की नई मशाल भी जला रही है।
पलाश के फूलों से प्रगति का मार्ग
यह गुलाल रसायनों से पूरी तरह मुक्त और त्वचा के लिए सुरक्षित है। महिलाओं के समूह ने जंगल से पलाश (टेसू) के फूल एकत्रित कर, उन्हें सुखाकर और पारंपरिक विधियों से पीसकर बेहतरीन गुलाल तैयार किया है।
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पीला रंग: हल्दी के मिश्रण से तैयार।
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सुगंधित अनुभव: गुलाब की पंखुड़ियों और गुलाब जल का प्रयोग।
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प्राकृतिक शुद्धता: कॉर्न स्टार्च का आधार, जो इसे रसायनों से बेहतर बनाता है।
सशक्तिकरण और आर्थिक आत्मनिर्भरता
इस सीजन में इन समूहों ने 100 किलो से अधिक हर्बल गुलाल तैयार किया है, जो अब बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध है। 50 ग्राम और 100 ग्राम के आकर्षक पैक और विशेष ‘गिफ्ट हैंपर’ के रूप में इसे पेश किया जा रहा है।
यह पहल केवल गुलाल बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इन महिलाओं के लिए जीविका का एक मजबूत आधार बन गई है। रसायनों से बेहतर यह उत्पाद प्राकृतिक होली का संदेश दे रहा है।” — स्वरूप दीक्षित, डीएफओ, पूर्व वनमंडल छिंदवाड़ा
सामूहिक प्रयास की विजय
वन-धन केंद्र की अध्यक्ष रम्पत भारती और सचिव सरिता भारती के नेतृत्व में महिलाएँ पिछले एक माह से इस मिशन में जुटी हैं। परिक्षेत्र अधिकारी नीरज बिसेन और उनकी टीम के सतत प्रोत्साहन ने इन महिलाओं के आत्मविश्वास को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है।
यह खबर इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि स्थानीय कौशल को सही दिशा और विभाग का सहयोग मिले, तो ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भरता के वैश्विक उदाहरण पेश कर सकती हैं।
‘हुनर को मिला बाजार’
एसडीओ अनादि बुधौलिया ने इस गौरवमयी उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा हमारा मुख्य उद्देश्य केवल प्राकृतिक उत्पादों को बढ़ावा देना ही नहीं, बल्कि अंतिम छोर पर बैठी महिला को ‘सशक्त और आत्मनिर्भर’ बनाना है। पूर्व वनमंडल छिंदवाड़ा के अंतर्गत संचालित ‘वन-धन विकास केंद्र सारना’ आज इसी संकल्प का प्रतीक बन गया है। इन आदिवासी महिलाओं ने टेसू के फूलों से जो हर्बल गुलाल तैयार किया है, वह रसायनों के इस दौर में प्रकृति की ओर लौटने का एक सुंदर संदेश है।”
“वन विभाग ने इन समूहों को न केवल तकनीकी मार्गदर्शन दिया, बल्कि उत्पाद की बेहतर पैकेजिंग और मार्केटिंग के लिए भी मंच उपलब्ध कराया है। आज यह गुलाल सीसीएफ कार्यालय के पास उपलब्ध है, और जिस तरह से लोग इसे पसंद कर रहे हैं, उससे इन महिलाओं के लिए आर्थिक विकास के नए द्वार खुल गए हैं। यह पहल यह सिद्ध करती है कि स्थानीय संसाधनों का सही दोहन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कैसे बदल सकता है।”
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