छिंदवाड़ा में कानून का पहरा इतना कमजोर पड़ गया है कि छात्रा की पुकार भी थाने की दीवारें न सुन सकीं। पुलिस की वृहन्नला कार्यशैली का पर्दाफाश तब हुआ जब पिता के आंसुओं ने सांसद बंटी साहू को चौकी तक खींच लाया।
जहाँ पुलिस जनता की ढाल बननी चाहिए, वहीं छिंदवाड़ा में शिकायत करने वाले ही घंटों न्याय की भीख माँगते रहे। छात्रा की पीड़ा ने वो सच उजागर किया है कि पूरा तंत्र सिर्फ खामोश नहीं—अंदर से सड़ा हुआ है।
एक बेटी की चीख चौकी में दब गई, पिता की आँखों के आंसू सूख गए, पर पुलिस की संवेदनशीलता जागी नहीं। सांसद बंटी साहू के हस्तक्षेप ने वो किया जो वर्दीधारी घंटों न कर सके—न्याय की पहली सीढ़ी को खोलना।
✍️ रिपोर्ट : राकेश प्रजापति
छिंदवाड़ा// जिले में कानून-व्यवस्था का ढांचा किस हद तक खोखला हो चुका है, इसकी सबसे शर्मनाक मिसाल शुक्रवार को तब सामने आई जब कुंडीपुरा थाना क्षेत्र की धरमटेकड़ी चौकी में एक कॉलेज छात्रा की छेड़छाड़ की शिकायत को घंटों तक रद्दी की तरह फेंक दिया गया।
चौकी प्रभारी अविनाश पारधी की बेरुखी, संवेदनहीनता और गिरफ्तारी से बचने की कोशिशों ने जिले की पुलिस को रीढ़ हीन बना दिया है।
छात्रा रोती रही, पिता गिड़गिड़ाते रहे… पर FIR नहीं
दोपहर 12 बजे कॉलेज छात्रा और उसके माता-पिता शिकायत लेकर चौकी पहुँचे।
लेकिन घंटों गुजर गए— न FIR, न कार्रवाई, न पूछताछ, और न अपराधी को पकड़ने की चिंता।
पिता की आँखों में आंसुओं की अविरल धारा बहती रही, पर चौकी में बैठे वर्दी वालों का दिल पत्थर से भी सख्त साबित हुआ।
सूत्रों का दावा है कि पीड़ित छात्रा को थाने में बैठाए रखने के दौरान वही आरोपी युवक चौकी में आकर उसे धमकाकर चला गया, और पुलिस मूकदर्शक बनी रही।
अगर यह सच है तो यह केवल लापरवाही नहीं— कानून की हत्या का लाइव प्रदर्शन है।
सांसद विवेक बंटी साहू का हस्तक्षेप—तंत्र की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण
जब पुलिस ने हर सीमा पार कर दी, छात्रा का परिवार टूट गया, तब मजबूरी में पिता ने सांसद विवेक बंटी साहू को फोन किया।
सांसद ने जैसे ही पूरा मामला सुना—तुरंत चौकी पहुँच गए और पुलिस को कड़े शब्दों में फटकार लगाई।
स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि सांसद को चौकी में धरने तक बैठने की तैयारी करनी पड़ी।
यह दृश्य ही बताता है कि जिले में कानून व्यवस्था की बागडोर प्रशासन नहीं, बल्कि खुद बेताल होकर घूम रहे अपराधियों के हाथ में चली गई है।
अपराधों की बाढ़—छिंदवाड़ा की पुलिस कहाँ सो रही है ?
पिछले कुछ महीनों में जिले की बदहाली का ग्राफ:
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जुएं-फाड़ रात-दिन धड़ल्ले से
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अवैध हथियारों की जमकर बरामदगी
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अवैध शराब का साम्राज्य, जैसे कानून कोई मजाक हो
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महिलाओं के साथ अत्याचार और छेड़छाड़ की घटनाएं तेजी से बढ़ीं
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शहर के हर कोने से अपराधियों का मनोबल आसमान पर
और इन सबका एक ही कारण—पुलिस प्रशासन की नाकामी, सुस्ती, और कई मामलों में मिलीभगत।
पुलिस को जगाने के लिए सांसद को धरने की धमकी देना पड़े—इससे बड़ा शर्म क्या ?
सांसद की दखल के बाद ही FIR दर्ज हुई।
मतलब साफ है—
- पुलिस अपने दम पर कुछ नहीं करेगी।
- संवेदनशील मामलों में भी पुलिस की कार्यप्रणाली मर चुकी है।
- वर्दी अब सिर्फ वर्दी रह गई है—कर्तव्य गायब, संवेदनशीलता गायब।
पीड़ित परिवार न्याय की उम्मीद लेकर चौकी गया था, पर मिला—उपेक्षा, अत्याचार और गहरी निराशा।
आज की घटना कोई अपवाद नहीं—यह जिले में गिरती कानून व्यवस्था का क्लाइमेक्स है
छिंदवाड़ा में पुलिस की निष्क्रियता अब लोगों की सुरक्षा पर सीधा हमला बन चुकी है।
आज छात्रा थी…
कल कोई और होगा।
क्योंकि अपराधी जानते हैं—यहाँ पुलिस की नब्ज़ एक आदेश पर चलती है, कर्तव्य पर नहीं।
अंतिम सार ..
आज का दिन छिंदवाड़ा पुलिस के लिए काला दिन है।
सांसद की दखल के कारण छात्रा की रिपोर्ट दर्ज हो गई—
पर सवाल बड़ा है:
क्या पुलिस तंत्र इतना खोखला हो चुका है कि पीड़ितों को FIR लिखवाने के लिए अब सांसदों को बैठे-बैठे थानों में धरना देना पड़ेगा?
अगर हाँ—
तो जिले की सुरक्षा भगवान भरोसे है।