प्रशासन की नाक के नीचे रिश्वतखोरी ! परासिया में अकाउंटेंट को रंगे हाथों दबोचा

छिंदवाड़ा // जिले के सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक ‘लाईलाज बीमारी’ बन चुका है। इस बीमारी का संक्रमण किस कदर फैल चुका है, इसका शर्मनाक उदाहरण आज 17 फरवरी 2026 को नगर पालिका डोंगर परासिया में देखने को मिला। यहाँ पदस्थ एक अकाउंटेंट को जबलपुर EOW की टीम ने 5000 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों दबोचा है। लेकिन यह कार्रवाई केवल एक कर्मचारी की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि जिला प्रशासन के उन आला अधिकारियों के गाल पर तमाचा है, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर सुशासन का दावा करते हैं।

गरीब की गाढ़ी कमाई पर गिद्धों की नजर मामला व्यवस्था की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। प्रार्थी लाल, पिता स्व. सुन्दर लाल एक सफाई कर्मी जिसने अपनी पूरी जिंदगी गंदगी साफ करने में खपा दी, अगस्त 2025 में सेवानिवृत्त हुआ। कायदे से उसे उसका ग्रेच्युटी और पेंशन का हक सम्मान के साथ मिलना चाहिए था। लेकिन नगर पालिका में बैठे भ्रष्ट तंत्र ने उसे भी नहीं बख्शा। अकाउंटेंट शैलेन्द्र शर्मा (54 वर्ष) ने इस हक को जारी करने के बदले 25,000 रुपये की घूस मांगी। शर्म की बात यह है कि पीड़ित पहले ही 20,000 रुपये दे चुका था, फिर भी सिस्टम का पेट नहीं भरा और शेष 5,000 रुपये के लिए उसे प्रताड़ित किया जाता रहा।

समीक्षा बैठकों के नाम पर सिर्फ ‘खानापूर्ति’ यह घटना सीधे तौर पर जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। कलेक्ट्रेट और जिला स्तर पर आए दिन होने वाली ‘समीक्षा बैठकों’ (Review Meetings) में आखिर होता क्या है ? क्या जिम्मेदार अधिकारी कभी यह जानने की जहमत उठाते हैं कि एक सेवानिवृत्त कर्मचारी 6 महीने से अपनी पेंशन के लिए धक्के क्यों खा रहा है ?

हकीकत यह है कि ये बैठकें चाय-नाश्ते और आंकड़ों की बाजीगरी तक सीमित रह गई हैं। अगर आला अधिकारियों का मैदानी अमले पर रत्ती भर भी नियंत्रण होता, या उनकी निगरानी तंत्र (Monitoring System) सक्रिय होता, तो एक अधीनस्थ कर्मचारी की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह कार्यालय परिसर में खुलेआम रिश्वत की बोली लगाए। अधिकारियों की यह ‘निकम्मी कार्यप्रणाली’ ही है जिसने भ्रष्टाचार को खाद-पानी देकर इतना विकराल बना दिया है।

भ्रष्टाचार: एक लाइलाज बीमारी EOW जबलपुर की यह कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या इससे व्यवस्था सुधरेगी ? एक शैलेन्द्र शर्मा के पकड़े जाने से भ्रष्टाचार का वह ढांचा नहीं ढहने वाला, जिसकी नींव में कमीशनखोरी और लापरवाही का सीमेंट लगा है। जब तक जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागते और अपनी जवाबदेही तय नहीं करते, तब तक आम आदमी इसी तरह पिसता रहेगा।

17 फरवरी को परासिया में जो हुआ, वह केवल एक ट्रैप नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि छिंदवाड़ा में प्रशासनिक डर खत्म हो चुका है और भ्रष्टाचार की इस दीमक को मारने के लिए फिलहाल कोई ठोस ‘पेस्टिसाइड’ प्रशासन के पास मौजूद नहीं है।