छिंदवाड़ा जिले में कड़ाके की ठंड के बीच बिछुआ से मानवता और अपनत्व की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आई है। यहाँ बच्चों के ठिठुरते हाथों को जब गर्म कम्बलों का सहारा मिला, तो उनके चेहरों पर बिखरी मुस्कान ने सर्द हवाओं की चुभन को भी कम कर दिया।
बिछुआ/ छिंदवाड़ा – जिले में इस समय ठंड का कहर अपने चरम पर है। कड़कड़ाती धूप भी बेअसर साबित हो रही है और रात का पारा गोता लगा रहा है। ऐसे संवेदनशील समय में, बिछुआ विकासखंड के शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में एक ऐसा आयोजन हुआ, जिसने न केवल बच्चों को ठंड से राहत दी, बल्कि समाज में मानवीय संवेदनाओं की एक नई मिसाल पेश की।
चेहरों पर लौटी मुस्कान
समाजसेवी नितेश बेलवंशी और विकास भोयकर के सहयोग से विद्यालय के बच्चों को कंबल और स्वेटर वितरित किए गए। जैसे ही इन बच्चों के कंधों पर गर्म कपड़ों की चादर ओढ़ाई गई, उनके मासूम चेहरों पर आई खुशी देखने लायक थी। यह केवल कपड़ों का वितरण नहीं था, बल्कि उन बच्चों के लिए एक भरोसा था कि इस समाज में उनकी चिंता करने वाले हाथ मौजूद हैं।
तीन वर्षों से जारी है सेवा का संकल्प
विद्यालय के प्राचार्य सुरेश बरखे ने भावुक होते हुए बताया कि यह नेक कार्य पिछले तीन वर्षों से निरंतर जारी है। उन्होंने कहा:
“लगातार तीन वर्षों से हम जनसहयोग के माध्यम से बच्चों को सुरक्षा का कवच प्रदान कर रहे हैं। ऐसे कार्यक्रमों से बच्चों के भीतर ‘अपनेपन’ की भावना जागृत होती है, जो उन्हें मानसिक रूप से सशक्त बनाती है।”
लक्ष्य: स्वास्थ्य भी और शिक्षा भी
समाजसेवी नितेश बेलवंशी और विकास भोयकर ने इस पहल के पीछे का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा कि बढ़ती ठंड बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य में बाधा न बने, यही उनकी प्राथमिकता है। नितेश बेलवंशी ने बच्चों से एक भावुक अपील भी की:
“इन बच्चों के चेहरों की खुशी ही हमारा असली सुकून है। लेकिन यह सुकून तब और बढ़ जाएगा, जब आप पिछले वर्ष की तरह इस साल भी शत-प्रतिशत परिणाम लाकर स्कूल और जिले का नाम रोशन करेंगे।”
शिक्षक और समाज का अनूठा संगम
इस कार्यक्रम की खास बात यह रही कि जहाँ समाजसेवियों ने तन ढकने का इंतजाम किया, वहीं शिक्षकों ने बच्चों के लिए स्नेहपूर्ण भोजन की व्यवस्था की। कार्यक्रम को सफल बनाने में वैभव अलोनी, रंजीत रत्ने, वर्मा सर, रेणुका गड़करी, सहारे मैडम और अन्य सभी शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
कंबल की गर्माहट और शिक्षकों का दुलार मिलकर बच्चों के मनोबल को सातवें आसमान पर ले गया है। जब समाज और शिक्षा जगत इस तरह कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं, तो निश्चित रूप से परिणाम केवल ‘रिजल्ट’ में नहीं, बल्कि बेहतर ‘इंसान’ बनने में भी दिखते हैं।