आदिवासी होस्टल में ‘गुलामी, अधीक्षक पर गिरी गाज

आदिवासी नौनिहालों के भविष्य पर ‘मजदूरी’ का ग्रहण, शिक्षा के मंदिर को अधीक्षक ने बनाया निजी चारागाह

बटकाखापा छात्रावास मामला: भुट्टे तुड़वाने वाले अधीक्षक देवेश साहू पर गिरी गाज, लेकिन सवालों के घेरे में पूरा तंत्र भ्रष्ट तंत्र का खेल: आदिवासियों के नाम पर करोड़ों की योजनाएं, पर जमीन पर मासूमों से कराई जा रही गुलामी

✍️  त्वरित टिप्पणी : राकेश प्रजापति 

छिंदवाड़ा जिले में जनजाति कार्य विभाग द्वारा संचालित छात्रावास अब शिक्षा के केंद्र न रहकर ‘श्रम के अड्डे’ बनते जा रहे हैं। हर्रई विकासखंड के बटकाखापा आदिवासी सीनियर बालक छात्रावास से सामने आई शर्मनाक घटना ने न केवल जिला प्रशासन, बल्कि प्रदेश सरकार की मंशा पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में कलम और किताब होनी चाहिए, वहाँ छात्रावास अधीक्षक ने उन्हें खेतों में मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया।

शिक्षा की आड़ में शोषण का खेल

जानकारी के अनुसार, बटकाखापा छात्रावास के अधीक्षक देवेश साहू मासूम आदिवासी छात्रों को अपनी निजी जागीर समझकर उनसे खेतों में भुट्टे तुड़वाने का काम लेते थे। गरीब आदिवासी माता-पिता ने अपने बच्चों को इस उम्मीद के साथ हॉस्टल भेजा था कि वे पढ़-लिखकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ेंगे, लेकिन यहाँ तो रक्षक ही भक्षक बन बैठा।

यह मामला तब उजागर हुआ जब कलेक्टर की चौपाल में हिम्मत जुटाकर बच्चों ने खुद अपनी आपबीती सुनाई। इसके बाद सहायक आयुक्त ने जांच के नाम पर खानापूर्ति करते हुए देवेश साहू को सिर्फ पद से हटाकर हर्रई कार्यालय में कार्यमुक्त कर दिया है ! सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों से मजदूरी कराना केवल एक विभागीय गलती है ? क्या यह बालश्रम प्रतिषेध अधिनियम और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन नहीं है ?

जिम्मेदारों की ‘मौन’ सहमति और अधिकारियों का निकम्मापन

जिले में बैठे सहायक आयुक्त और निगरानी के लिए नियुक्त मंडल व क्षेत्र संयोजकों की भूमिका इस पूरे मामले में संदेहास्पद है। नियमतः इन अधिकारियों को छात्रावासों का नियमित दौरा करना चाहिए, फिर उनकी नाक के नीचे यह ‘गुलामी का खेल’ कैसे चलता रहा ?

  • अधिकारियों की मिलीभगत: क्या जिलें में बैठे सहायक आयुक्त इन लापरवाह अधीक्षकों को संरक्षण दे रहे हैं ?

  • निगरानी तंत्र फेल: निगरानी के लिए नियुक्त अधिकारी केवल अपनी जेब भरने और कागजी खानापूर्ति में व्यस्त हैं, उन्हें इन नौनिहालों के भविष्य की कोई फिक्र नहीं है।

सरकारी योजनाओं को ‘पलीता’ लगाते जिम्मेदार

एक ओर सरकार आदिवासियों के उत्थान के लिए करोड़ों का बजट आवंटित करती है, वहीं दूसरी ओर छिंदवाड़ा के ये ‘सिस्टम के दीमक’ उस बजट और योजना को डकार रहे हैं। बच्चों को मिलने वाली सुविधाएं अधीक्षक और अधिकारियों की मिलीभगत की भेंट चढ़ रही हैं। आदिवासी समाज के बच्चों की उपेक्षा यह दर्शाती है कि जिला प्रशासन के लिए ये बच्चे सिर्फ एक संख्या हैं, इंसान नहीं।

कानूनी पहलुओं की अनदेखी: केवल हटाना काफी क्यों ?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों से मजदूरी कराना एक गंभीर अपराध है। ऐसे अधीक्षक पर कठोर कार्रवाई (FIR) होनी चाहिए थी, न कि केवल पद से हटाकर मामला रफा-दफा करना चाहिए था।

  • बाल श्रम कानून: क्या प्रशासन ने इस कानून के तहत कार्रवाई की ?

  • अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम: क्या छात्रावास में रहने वाले इन बच्चों के मानसिक और शारीरिक शोषण पर यह एक्ट नहीं लगना चाहिए ?

निकम्मे जनप्रतिनिधि और संवेदनहीन प्रशासन

जिले के जनप्रतिनिधि भी इस ‘शिशु शोषण ‘ पर मौन साधे हुए हैं। चुनाव के समय आदिवासी प्रेम दिखाने वाले ये नेता अब कहाँ छिपे हैं ? प्रशासन के निकम्मे अधिकारियों और मूक जनप्रतिनिधियों की जुगलबंदी ने छिंदवाड़ा के आदिवासी छात्रावासों को भ्रष्टाचार और शोषण का गढ़ बना दिया है।

बटकाखापा की घटना सिर्फ एक बानगी है। यदि जिले के सभी आश्रमों और छात्रावासों की निष्पक्ष जांच हो, तो कई ‘देवेश साहू’ बेनकाब होंगे। अब समय है कि जिला प्रशासन केवल छोटी मछलियों पर कार्रवाई न कर, उस पूरे तंत्र को बदले जो बच्चों को अपनी जागीर समझता है।