महिलाओं में ‘बीयर’ की बहार : संस्कृति का पतन या आधुनिकता ?

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में एक ऐसा ‘जाम’ छलकाया है, जिसकी खुमारी से समाजशास्त्रियों और संस्कृति के प्रहरियों की नींद उड़ गई है। एक तरफ पूरा देश शराब से तौबा कर रहा है, वहीं मध्य प्रदेश की महिलाओं ने इस मामले में राष्ट्रीय औसत (1.01%) को पछाड़ते हुए 1.2% का आंकड़ा छू लिया है।

इस 0.2% की वृद्धि ने पूरे प्रदेश में एक दार्शनिक बहस छेड़ दी है: क्या यह हमारी महान संस्कृति का नैतिक पतन है, या फिर महानगरीय चकाचौंध की चमकती हुई नई जीवनशैली ? आइए, इस आंकड़ों के झाग के नीचे छिपी सामाजिक सच्चाई का एक व्यंग्यात्मक और विश्लेषणात्मक मुआयना करते हैं

✍️   राकेश प्रजापति 

आंकड़ों का ‘नशा’: सर्वे की खास बातें

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 715 जिलों और 6.79 लाख परिवारों के बीच हुए इस महा-सर्वेक्षण ने जो सच उगला है, वह कुछ यूं है:

  • राष्ट्रीय औसत चित, एमपी हिट: जहां पूरे भारत की महिलाएं शराब से दूरी बना रही हैं, वहीं एमपी की महिलाओं ने विपरीत दिशा में जाते हुए पिछले सर्वे (1%) से इस बार 1.2% तक की छलांग लगा दी है।

  • पुरुषों की तुलना में तेज विकास: प्रदेश में शराब पीने वाले पुरुषों की संख्या में उतनी तेजी से वृद्धि नहीं हुई, जितनी महिलाओं के प्रतिशत में दर्ज की गई है।

  • बीयर बनी ‘मिल्क ऑफ चॉइस’: हार्ड ड्रिंक्स को किनारे कर, मध्य प्रदेश में महिलाओं और पुरुषों दोनों ने बीयर को अपना सबसे पसंदीदा पेय पदार्थ घोषित कर दिया है। गर्मी के मौसम और चिलचिलाती बीयर के बीच एक नया सामाजिक गठबंधन बन गया है।

नैतिक पतन या आधुनिकता की चकाचौंध ?

इस खबर को किस चश्मे से देखा जाए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस सदी में खड़े होकर सोच रहे हैं। इस बहस को तीन मुख्य पहलुओं में समझा जा सकता है:

1. ‘संस्कृति खतरे में है ‘ हमारे समाज का एक अलिखित नियम है—अगर पुरुष शाम को दो घूंट लगा ले, तो वह दिन भर की ‘थकान’ उतार रहा है। लेकिन अगर एक महिला के हाथ में बीयर का ग्लास दिख जाए, तो अचानक पूरी भारतीय संस्कृति, सभ्यता और हजारों सालों की परंपराएं खतरे में पड़ जाती हैं! 1% से 1.2% की यह वृद्धि असल में सिर्फ 0.2% है, लेकिन नैतिकता के तराजू पर यह वजन इतना भारी है कि पूरी सभ्यता का ढांचा चरमराने लगता है।

2. महानगरीय जीवनशैली का ‘कूल’ फैक्टर आजकल ‘स्ट्रेस’ सिर्फ पुरुषों की बपौती नहीं रहा। कॉरपोरेट जॉब्स, ईएमआई का तनाव और वीकेंड की पार्टियों ने जेंडर के भेद को मिटा दिया है। समाजशास्त्रियों के अनुसार, यह ‘महानगरीय संस्कृति’ है। अब बीयर पीना सिर्फ नशा नहीं, बल्कि ‘सोशलाइजिंग’ का एक तरीका है। यह आधुनिक युग की वह चकाचौंध है जहां हाथ में बीयर का मग होना आपके ‘कूल’ और ‘स्वतंत्र’ होने का प्रमाण पत्र बन गया है।

3. सामाजिक स्वीकार्यता और बदलता बाजार सच यह है कि बाजार ने भी इस बदलाव को हाथों-हाथ लिया है। अब पब और बार केवल अंधेरे, धुएं से भरे और सिर्फ पुरुषों के लिए आरक्षित अड्डे नहीं रहे। वे अब ‘फैमिली फ्रेंडली’ और ‘कपल फ्रेंडली’ लाउंज बन चुके हैं। जब समाज खुद ऐसे स्थानों को स्वीकार कर रहा है, तो फिर वहां जाने वालों की संख्या तो बढ़ेगी ही।

झाग के नीचे की सच्चाई :

इस 1.2% के आंकड़े को न तो पूरी तरह से ‘महा-पतन’ कहा जा सकता है और न ही ‘स्वर्ण युग की शुरुआत’। यह सिर्फ एक बदलता हुआ समाज है, जो अपनी पुरानी केंचुली उतार कर नई, थोड़ी अधिक ‘चकाचौंध’ वाली टी-शर्ट पहन रहा है।

जब तक समाज में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग मापदंड रहेंगे, तब तक ऐसे आंकड़े हमेशा चौंकाते रहेंगे। अंततः, बदलाव की इस आंधी में संस्कृति का पतन हो रहा है या आधुनिकता का जश्न मनाया जा रहा है, यह फैसला आप अपने हाथ में चाय का कप (या शायद बीयर का मग) लेकर खुद कर सकते हैं !