‘स्वच्छता’ के नाम पर ‘ज़हर’ का व्यापार और ‘शर्मनिरपेक्ष’ सरकार
मौत का घूंट पी रहा है देश का सबसे स्वच्छ शहर
संपादकीय : राकेश प्रजापति
इंदौर जिसे हम लगातार आठ बार से देश का सबसे स्वच्छ शहर होने का गौरव देते आए हैं, आज वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘शर्म’ का विषय बन चुका है। जिस शहर की सफाई की मिसालें दी जाती थीं, उसी शहर की नसों (पाइप लाइनों) में आज मलमूत्र और ज़हर बह रहा है। दूषित पानी पीने से अब तक दर्जनों मौतें हो चुकी हैं और सैकड़ों लोग अस्पतालों में अपनी अंतिम साँसें गिन रहे हैं।
1. क्या ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार में संवेदना खत्म हो चुकी है ?
वरिष्ठ पत्रकारों ने व्यवस्था पर सीधा हमला करते हुए सरकार को ‘शर्मनिरपेक्ष’ करार दिया है। जब इंदौर में लाशें गिर रही थीं, लोग अस्पताल में तड़प रहे थे, तब प्रदेश के मुखिया और प्रभारी मंत्री सार्वजनिक मंचों पर ‘रेवड़ी’ का स्वाद ले रहे थे।
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सवाल: क्या जनता की जान की कीमत मंत्रियों के जन्मदिन और उत्सवों से कम है ?
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हकीकत: जब शहर में 14 मौतें हो चुकी थीं और अखबारों में उनके शवों की तस्वीरें छप रही थीं, तब सरकार की स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट में केवल 4 मौतों का आंकड़ा पेश कर रही थी। क्या यह रिपोर्ट बनाने वाले अधिकारी अंधे थे या यह सीधे तौर पर सत्य की हत्या करने की साजिश थी ?
2. ‘नंबर वन’ का खोखलापन: सीवर और पेयजल की जुगलबंदी
इंदौर की सफाई का सच यह है कि जहाँ से पीने के पानी की पाइप लाइन गुजरती है, उसके ठीक बगल से सीवर की लाइन चलती है।
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प्रशासनिक विफलता: नगर निगम और प्रशासन को यह तक नहीं पता कि पानी में लीकेज कहाँ है और मलमूत्र कहाँ मिल रहा है। प्रशासन टैंकर भेज रहा है, लेकिन उन टैंकरों का पानी भी दूषित पाया गया है।
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अफसरशाही की तानाशाही: स्थानीय पार्षदों ने 10 दिन पहले ही गंदे पानी की शिकायत लिखित में दी थी, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह स्पष्ट करता है कि अफसरशाही नेताओं के निर्देशों को रद्दी की टोकरी में फेंक रही है।
3. कोर्ट की फटकार: ‘सरकार का जवाब संवेदनहीन है’
इंदौर हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने सरकार की स्टेटस रिपोर्ट को ‘संवेदनहीन’ करार दिया है।
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चीफ सेक्रेटरी को बुलावा: कोर्ट ने इस भयावह स्थिति पर अब मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को तलब किया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यह शहर की छवि का ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का हनन है।
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सात श्रेणियों में निर्देश: कोर्ट ने प्रभावितों को मुआवजा, जिम्मेदारी तय करना और पारदर्शी जांच जैसी सात श्रेणियों में निर्देश जारी किए हैं, जो काम सरकार को खुद करना चाहिए था।
4. राजनीति और षड्यंत्र का अड्डा बनता इंदौर
अंदेशा यह भी जताया जा रहा है कि इंदौर के इस ‘ज़हर कांड’ के पीछे नेताओं की आपसी खींचतान और षड्यंत्र भी हो सकते हैं। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में आम जनता की जान को दांव पर लगा दिया गया है।
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विपक्ष का मौन: विपक्ष (कांग्रेस) भी केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित है। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, विपक्ष भी अब लड़ना भूल चुका है, जिसके कारण जनता बेसहारा है।
क्या हम सिर्फ यादें बनकर रह जाएंगे ?
पेटलावद कांड हो या चूहा कांड, मध्य प्रदेश की सरकारों का इतिहास रहा है कि वे वक्त के साथ बड़ी से बड़ी त्रासदियों को फाइलों में दबा देती हैं। इंदौर के लोग आज पूछ रहे हैं कि उनके अपनों की मौत का जिम्मेदार कौन है ? क्या यह स्वच्छता का ‘नंबर वन’ तमगा उन मासूमों की जान से बढ़कर है ?
यह खबर केवल दूषित पानी की नहीं है, बल्कि उस दूषित तंत्र की है जो सत्ता के मद में अपनी जनता को ज़हर पिला रहा है।