सरकारी सामान की चोरी, सहायक आयुक्त और अधीक्षक पर उठे सवाल

महा-घोटाला: जनजाति कल्याण विभाग के ‘रक्षक’ ही बने सरकारी संपत्ति के ‘भक्षक’, सहायक आयुक्त की चुप्पी पर उठे सवाल

खापाभाट छात्रावास कांड: अधीक्षक तुलाराम चौरे और बाबू मनोज धाकड़े ने मिलकर की सरकारी सामान की ‘डकैती’, क्या कुंभकर्णी नींद में सोया है विभाग ?

छिंदवाड़ा। सरकारी तंत्र जब भ्रष्टाचार की दीमक से खोखला हो जाए, तो ‘जनजाति कल्याण’ जैसे पवित्र नाम वाले विभाग भी बंदरबांट का अड्डा बन जाते हैं। खापाभाट छात्रावास में जो हुआ, वह केवल सामान की हेराफेरी नहीं है, बल्कि जनजाति कल्याण विभाग के सहायक आयुक्त सत्येंद्र मरकाम और उनके अधीन काम करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के ‘निकम्मेपन’ का जीता-जागता प्रमाण है।

भ्रष्टाचार की जुगलबंदी: चौरे और धाकड़े का ‘ऑपरेशन क्लीन’

रात के सन्नाटे में छात्रावास अधीक्षक तुलाराम चौरे और कलेक्ट्रेट में पदस्थ बाबू मनोज धाकड़े ने जिस शातिराना अंदाज में साजिश रची, वह किसी पेशेवर अपराधी से कम नहीं है।

  • साजिश: रात के अंधेरे में छात्रावास के सीसीटीवी कैमरों को ‘डेड’ (बंद) किया गया।

  • लूट: ऑटो रिक्शा में पलंग, गद्दे और अलमारियां लादकर बाबू के घर पहुँचा दी गईं।

  • फर्जीवाड़ा: पकड़े जाने पर सत्येंद्र मरकाम के नाक के नीचे फर्जी ‘लीज’ लेटर तैयार किए गए, जिसमें अलमारी के साथ-साथ पलंग और गद्दे ‘उधार’ देने की हास्यास्पद कहानी गढ़ी गई।

सहायक आयुक्त सत्येंद्र मरकाम की जवाबदेही कहाँ ?

इस पूरे शर्मनाक घटनाक्रम ने सहायक आयुक्त सत्येंद्र मरकाम की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि:

  1. विभाग के मुखिया होने के नाते मरकाम साहब का अपने अधीनस्थों पर नियंत्रण शून्य क्यों है ?

  2. जब सरेआम सीसीटीवी बंद कर सरकारी संपत्ति लूटी जा रही थी, तब विभाग का निरीक्षण तंत्र कहाँ सोया था ?

  3. केवल ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी करना क्या अपराधियों को बचाने की एक ‘सेफ एग्जिट गली है ?

टिप्पणी: एक लिपिक (बाबू) और एक अधीक्षक की इतनी हिम्मत तभी हो सकती है जब उन्हें ऊपर बैठे ‘बड़े साहबों’ का मूक समर्थन प्राप्त हो या फिर विभाग पूरी तरह राम भरोसे चल रहा हो।

नियमों की धज्जियां: यह ‘कदाचरण’ नहीं, ‘अपराध’ है

मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1966 के तहत यह मामला गंभीर कदाचरण और गबन का है।

  • नियम 3: हर सरकारी सेवक को पूर्ण सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता बनाए रखनी चाहिए। सरकारी संपत्ति को निजी हित में उपयोग करना सेवा से तत्काल बर्खास्तगी का आधार है।

  • सहायक आयुक्त की विफलता: यदि कोई अधीनस्थ अधिकारी चोरी करता है, तो विभाग प्रमुख उसकी ‘निगरानी विफलता’ (Supervisory Failure) के लिए समान रूप से जिम्मेदार माना जाता है।

निकम्मेपन की पराकाष्ठा: छात्रों के हक पर डाका

जनजाति कल्याण विभाग का बजट उन बच्चों के लिए आता है जो दूर-दराज के गांवों से आकर शहर में पढ़ने का सपना देखते हैं। जब तुलाराम चौरे और मनोज धाकड़े जैसे लोग छात्रों के पलंग और गद्दे अपने घरों में सजाएंगे, तो गरीब छात्र ज़मीन पर सोएंगे ? यह अधिकारियों का निकम्मापन ही है कि आज सरकारी छात्रावास भ्रष्टाचार की चारागाह बन गए हैं।

जनता की मांग: नोटिस नहीं, निलंबन और FIR चाहिए !

प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि सहायक आयुक्त सत्येंद्र मरकाम इस मामले को ‘ठंडे बस्ते’ में डालने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन जागरूक जनता और छात्र संगठन अब चुप नहीं बैठेंगे।

मांग साफ है: * अधीक्षक तुलाराम चौरे और बाबू मनोज धाकड़े को तत्काल निलंबित किया जाए।

  • सरकारी संपत्ति की चोरी और साक्ष्य मिटाने (CCTV बंद करने) के जुर्म में IPC की धाराओं के तहत FIR दर्ज हो।

  • सहायक आयुक्त की भूमिका की जांच हो कि आखिर उनके कार्यकाल में विभाग इतना बेलगाम कैसे हो गया ?