योजनाएं लूट के हवाले, जवाबदेही गायब—कब जागेगा सिस्टम ?

तीसरी कड़ी: “ योजनाओं पर बैठा भ्रष्टाचार का गठजोड़ ”—महाप्रबंधक की भूमिका संदिग्ध, अब जवाबदेही और कार्रवाई की मांग तेज

विशेष टिप्पणी : राकेश प्रजापति 

छिंदवाड़ा। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और जन-मन योजना में लगातार सामने आ रहे गंभीर आरोप अब भ्रष्टाचार के सुसंगठित नेटवर्क का संकेत दे रहे हैं। लगातार खुलासों से साफ है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से की गई वसूली, फर्जी रिपोर्टिंग, एकाधिकार और सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचार का खेल हैऔर इस पूरे सिस्टम के केंद्र में फिर खड़ा है एक नाममहाप्रबंधक कविता पटवा

सवाल अब और तीखे हो गए हैं—और जवाब जरूरी

जब जिले में —

  • 950 से अधिक सड़कों का नियंत्रण एक PIU के हवाले

  • जन-मन योजना एक इंजीनियर के भरोसे

  • दर्जनों ब्रिज निर्माण बिना मॉनिटरिंग

  • जर्जर सड़कों के बावजूद भुगतान

  • चुनिंदा कार्रवाई और बाकी मामलों को “सेटिंग” से नस्ती करने के आरोप ,तो फिर यह सब संयोग कैसे हो सकता है ? क्या यह केवल प्रशासनिक कमजोरी है ?

या फिर जानबूझकर तैयार किया गया भ्रष्टाचार का रोडमैप ?

जवाबदेही से भाग क्यों रहा विभाग ?

यह सबसे बड़ा सवाल बन चुका है कि अगर सब कुछ ठीक है तो—
*  महाप्रबंधक इतने बड़े प्रोजेक्ट्स का ग्राउंड निरीक्षण क्यों नहीं करतीं ?
*  क्यों पूरी योजना दो–तीन लोगों के कब्जे में ?
*  क्यों ठेकेदारों पर दबाव, वसूली और पक्षपात के आरोप बार–बार ?
*  क्यों ग्रामीणों की पीड़ा तक विभाग नहीं देख रहा ?

यदि विभाग के पास सब ठीक है तो — खुले मंच पर ऑडिट, निरीक्षण और पब्लिक रिपोर्ट जारी क्यों नहीं ?

ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र भुगत रहे सबसे बड़ा नुकसान

इन योजनाओं का लक्ष्य ग्रामीण और आदिवासी विकास था। लेकिन सच्चाई यह है—

* कई सड़कों पर बड़े गड्ढे
* कई ब्रिज अधूरे
* कई कार्य कागजों में पूर्ण
* और जनता मजबूर ,आवागमन बाधित, शिक्षा–स्वास्थ्य प्रभावित, आर्थिक गतिविधियां ठप — यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि जनता के साथ विश्वासघात है।

अब सड़क से लेकर सत्ता गलियारों तक उठ रही आवाज़

जिले में —

  • ग्रामीण संगठन

  • समाजसेवी संस्थाएं

  • पीड़ित ठेकेदार

  • और जनप्रतिनिधि , सब एक सुर में कह रहे हैं— अब सिर्फ बयान नहीं, कार्रवाई चाहिए।

मांगें स्पष्ट—अब बचाव नहीं, जवाब

लोगों की प्रमुख मांगें —

*  पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच
*  वित्तीय और तकनीकी ऑडिट अनिवार्य
*  एकाधिकार खत्म कर कम से कम दो PIU की स्थापना
*  दोषी अधिकारियों पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई
*  जर्जर सड़कों और अधूरे प्रोजेक्ट की सार्वजनिक रिपोर्ट

क्या अब भी महाप्रबंधक चुप रहेंगी ?

लगातार बढ़ते आरोपों, सवालों और जनदबाव के बीच अब सबसे बड़ा प्रश्न है—
* क्या महाप्रबंधक कविता पटवा जवाब देंगी ?
* क्या विभाग अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेगा ?
* और सबसे बड़ा— क्या यह व्यवस्था सुधरेगी या भ्रष्टाचार का यह पहिया यूं ही चलता रहेगा ?

अगर अब भी कड़े कदम नहीं उठे, तो यह साफ हो जाएगा कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि संरक्षित और संचालित भ्रष्टाचार है—
जिसका खामियाज़ा भुगत रही है जनता।