प्रणाली का दबाव… और गिरते हुए मानवीय चेहरे
मतदाता पुनरीक्षण में बीएलओ का तमाशा: नशे में कलेक्ट्रेट पहुँचा कर्मचारी, सिस्टम पर बढ़ते दबाव की पोल खोल दी
“मैदान में टूटते कर्मचारी…कलेक्ट्रेट में नशे में बीएलओ”
संपादकीय टिप्पणी : राकेश प्रजापति
मतदाता पुनरीक्षण के बीच जो घटना जिलों से सामने आ रही है, वह किसी एक कर्मचारी का व्यक्तिगत पतन नहीं—यह पूरे तंत्र की चरमराती हुई हड्डियों की खड़खड़ाहट है। छिंदवाड़ा में सहायक बीएलओ का नशे की हालत में गणना पत्रक लेकर कलेक्ट्रेट पहुँचना केवल एक शर्मनाक वाकया नहीं, बल्कि उस विकराल दबाव की तसदीक है जिसमें आज देशभर के मैदानी कर्मचारी काम कर रहे हैं। सच यह है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण से लेकर सर्वे, जनगणना, पंचायत कार्य, स्वास्थ्य अभियान, पोषण ट्रैकिंग, राजस्व सर्वे, चुनावी ड्यूटी—हर जिम्मेदारी उसी वर्ग की पीठ पर लाद दी जाती है, जिसकी क्षमता तथा सीमा की जांच तक नहीं की जाती।
दबाव इतना कि “सिस्टम” मनुष्य को निगल रहा है
देश के कई राज्यों में, बीते दिनों में, 27 से अधिक मैदानी कर्मचारी एवं बीएलओ ड्यूटी के तनाव, हृदयाघात, थकान या अभियान-प्रेशर के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं।
यह आंकड़ा केवल मृत्यु संख्या नहीं—यह शासन-प्रशासन के कामकाज में छिपे हुए ‘अमानवीय दबाव’ का पोस्टमॉर्टम है।
जब किसी कर्मचारी से 12-14 घंटे की ड्यूटी, ग्रामीण क्षेत्रों में पैदल भ्रमण, घर-घर सत्यापन, ऐप आधारित डाटा एंट्री, डिजिटल अपलोड और साथ ही समय-सीमा में परिणाम देने की अपेक्षा होती है—तो वह मनुष्य रह ही कहाँ जाता है ?
वह मशीन बनने की कोशिश में धीरे-धीरे भीतर से टूटने लगता है।
आज की घटना उसी टूटन की आवाज़ है
नशे में धुत एक कर्मचारी कलेक्टर कार्यालय में सीधे गणना पत्र कलेक्टर के देने पहुंचा , वह यह कार्य करना नहीं चाहता था —यह घटना निंदनीय है, लेकिन इससे भी अधिक भयावह यह है कि वह किस मानसिक अवस्था में इस स्थिति तक पहुँचा ? क्या यह सामान्य कार्य-चक्र का परिणाम है ? या फिर वह दबाव का विस्फोट जो वर्षों से भीतर जमा हो रहा था ? ये सवाल सिर्फ इस कर्मचारी के लिए नहीं—पूरा सिस्टम इनके जवाब का मोहताज है।
मैदानी कार्यकर्ता “सड़क पर जलते हुए दीये” जैसे
आपदा हो या चुनाव, सर्वे हो या जनगणना—सबसे पहले इन्हें भेजा जाता है। न्यूनतम संसाधन, सुरक्षा नाममात्र, वेतन सीमित और अपेक्षाएँ अनंत।
काम बढ़ता गया, जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं, लेकिन न प्रशिक्षण बढ़ा, न मानसिक-स्वास्थ्य सहायता, न सुविधा।
यह असंतुलन आज ज्वालामुखी बन चुका है।
जांच तो जरूरी है, लेकिन उससे पहले ज़रूरी है—सच्चाई स्वीकारना
यह घटना सिर्फ जांच का विषय नहीं—यह प्रशासनिक ढांचे की खोखली नसों को उजागर करती है। किसी कर्मचारी का नशे में कार्यालय पहुँचना ‘व्यक्ति का अपराध’ जरूर है, पर उससे बड़ा अपराध वह व्यवस्था कर रही है जो कर्मचारियों को मानसिक और शारीरिक रूप से रसातल में धकेल देती है।
समाधान क्या है ?
- कार्य-भार का संतुलन
- हर अभियान के लिए पर्याप्त मानव संसाधन
- तनाव-नियंत्रण व मानसिक स्वास्थ्य सहायता
- सप्ताहिक विश्राम की अनिवार्यता
- चुनाव व जनगणना कर्मियों के लिए विशेष सुरक्षा व सुविधा
- मोबाइल ऐप-आधारित दबाव का पुनर्मूल्यांकन
- मैदानी कर्मचारियों की सुनवाई के लिए प्रकोष्ठ
निष्कर्ष : व्यवस्था तभी मजबूत होगी, जब उसके कंधों पर बोझ उठाने वाले मजबूत होंगे**
आज की घटना को सिर्फ ‘एक कर्मचारी का आचरण’ मानकर निपटा देना सच्चाई से भागना होगा।
यह घटना चेतावनी है—उस तूफ़ान की—जो तब आता है जब किसी व्यवस्था में काम की अपेक्षा, मनुष्य की क्षमता से बड़ी हो जाती है।
समय रहते यदि तंत्र ने इस दबाव को कम नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएँ और मौतें बढ़ेंगी—और हम एक-एक करके अपने ही सिस्टम के सिपाहियों को खो देंगे।
यही समय है—मानवीयता का सम्मान करने वाला प्रशासन खड़ा करने का।