गोदी मीडिया का सबसे बड़ा झूठ ! वेतन वृद्धि के नाम पर धोखा ..

गोदी मीडिया’ का नंगा नाच: बीएलओ की लाशों पर ‘बासी खबर’ का पर्दाफाश !

विशेष रिपोर्ट : राकेश प्रजापति

देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े चौकीदार, चुनाव आयोग (ECI) और उसके चिर-परिचित साथी ‘गोदी मीडिया’ (या ‘गटर मीडिया’) ने मिलकर इस बार एक ऐसा शर्मनाक कृत्य किया है, जिसने संस्थागत जवाबदेही और पत्रकारिता की बची-खुची गरिमा को भी तार-तार कर दिया है। एक तरफ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के नाम पर देश भर के बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) की जान जा रही है, तो वहीं दूसरी तरफ इस भयानक त्रासदी पर पर्दा डालने के लिए ‘बासी खबर’ का इस्तेमाल करके जनता को सरेआम बेवकूफ बनाया जा रहा है।

​यह रिपोर्ट उन बीएलओज़  की खून से सनी सच्चाई को सामने लाती है, जिनकी लाशों पर बैठकर मीडिया ने सत्ता के इशारे पर चार महीने पुराने एक सैलरी बढ़ाने वाले फैसले को ‘बम्पर ऐलान’ बनाकर परोस दिया।

​I. बीएलओज़ की पीठ पर ‘एफआईआर’ का कोड़ा: मौत ही एकमात्र जवाब ?
​बीएलओ की प्रताड़ना आज केवल विरोध प्रदर्शन का विषय नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आपदा बन चुकी है। एसआईआर का काम कर रहे शिक्षकों और कर्मचारियों पर अमानवीय लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव बनाया जा रहा है।

​टारगेट और धमकी: उत्तर प्रदेश में बीएलओज़ को 200 फॉर्म का लक्ष्य पूरा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है और ऐसा न करने पर सीधे एफआईआर दर्ज कराने की धमकी दी जा रही है।

अपमानजनक आत्महत्याएँ: उत्तर प्रदेश में एक बीएलओ ने अपनी शादी के ठीक एक दिन पहले आत्महत्या कर ली, क्योंकि अधिकारियों ने उनके घर जाकर सार्वजनिक रूप से उन्हें बेइज्जत किया और सस्पेंड कर दिया। यह कैसी व्यवस्था है, जहाँ एक दूल्हा बनने वाला व्यक्ति उत्सव के डर से मौत को गले लगा ले ?

​सुसाइड नोट और लाशें: गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान समेत कई ‘डबल इंजन’ राज्यों से बीएलओ की मौत, हार्ट अटैक और आत्महत्याओं की खबरें आ रही हैं। जान देने से पहले ये लोग बकायदा वीडियो और सुसाइड नोट्स छोड़ रहे हैं, जिनमें अधिकारियों के नाम लिखे हैं। ये नोट्स हमारी कानूनी व्यवस्था में सबसे बड़ा सबूत माने जाते हैं, लेकिन सिस्टम इन्हें ‘प्रोपेगेंडा’ बताकर खारिज कर रहा है।

​धिक्कार है ! बीएलओ की लाशों से जुड़ी खबरें ग्राउंड जीरो पर गूंज रही हैं, लेकिन ‘गोदी मीडिया’ अपनी आँखें, कान और ज़ुबान बंद करके सत्ता के पैरों में पड़ा हुआ है।

​II. सैलरी वृद्धि का छल: ‘गटर मीडिया’ का मास्टर स्ट्रोक
​जब एसआईआर के नाम पर देश भर में गुस्सा भड़क रहा था और बीएलओ सड़कों पर उतर रहे थे, तब चुनाव आयोग ने एक शर्मनाक PR स्टंट किया, जिसे ‘गटर मीडिया’ ने पूरी ताकत से जनता के गले उतारने की कोशिश की।

​4 महीने पुराना धोखा: नवंबर 2025 में, मीडिया ने खबर चलाई कि चुनाव आयोग ने बीएलओ का मानदेय ₹6,000 से बढ़ाकर ₹12,000 कर दिया है और प्रोत्साहन राशि भी बढ़ा दी है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह फैसला 2 अगस्त 2025 में ही लिया जा चुका था।

​साजिश का पर्दाफाश: चुनाव आयोग ने जानबूझकर एक बासी, पुरानी प्रेस रिलीज़ को दोबारा प्लांट किया ताकि जनता का ध्यान बीएलओ की मौतों, एफआईआर की धमकियों और चुनावी प्रक्रिया में आ रही खामियों से हट जाए। यह एक संस्थागत और सोची-समझी ‘डैमेज कंट्रोल’ की रणनीति थी।

​सवाल ‘गोदी मीडिया’ पर: क्या ये पत्रकार अनपढ़ गँवार हैं ? क्या इन्हें प्रेस रिलीज़ पर छपी तारीख (2/8/2025) पढ़नी नहीं आती ? नहीं। ये अनपढ़ नहीं, बल्कि जानकर बेईमान हैं। इन्हें पता था कि ये खबर पुरानी है, लेकिन सत्ता की चाटुकारिता में इन्होंने अपने दर्शकों को छलने का काम किया और जनता को बेवकूफ बनाया। इनकी पत्रकारिता का एकमात्र उद्देश्य सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाना है, भले ही इसके लिए इन्हें मरे हुए लोगों की पीठ पर बैठकर झूठ बेचना पड़े।

​III. चुनाव आयोग: संवैधानिक संस्था या प्रोपेगेंडा मशीन ?
​यह ‘गोदी मीडिया’ ही है, जिसने चुनाव आयोग को यह हिम्मत दी है कि वह एक संवैधानिक संस्था की तरह नहीं, बल्कि एक राजनीतिक पार्टी के प्रचार विंग की तरह काम करे।

​आयोग को शर्म नहीं आती?: रिपोर्ट में सही सवाल उठाया गया है कि चुनाव आयोग, जो एक निष्पक्ष संस्था है, वह चार महीने पुराने फैसले को इस तरह से क्यों पेश कर रहा है जैसे उसने कोई खजाना खोल दिया हो ? क्या चुनाव आयोग कोई सरकारी मंत्रालय है जो PR करता फिरे ?

​आलोचना के सामने दुबकना: जब पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष जैसे लोग भी आयोग के अधिकारी ज्ञानेश कुमार का नाम लेकर बीएलओ की दुर्दशा पर सवाल उठाते हैं , तो आयोग के पास सफाई देने के लिए सिर्फ ‘पुरानी खबरें प्लांट’ करने का शर्मनाक रास्ता बचता है।
​’गोदी मीडिया’ ने आयोग को यह विश्वास दिलाया है कि वह कितना भी बड़ा झूठ बोले, जनता तक केवल ‘चमचमाता नया पैकेट’ ही पहुँचेगा, भले ही अंदर माल बासी और खून से सना हो।

​IV. निष्कर्ष: इतिहास देगा जवाब
​बीएलओ की जान जाने की यह घटना, जिस पर ‘गोदी मीडिया’ ने बेशर्मी से पर्दा डालने की कोशिश की है, इतिहास में दर्ज होगी। आज जिस तरह यह सरकार नोटबंदी को इवेंट नहीं बनाती, उसी तरह भविष्य एसआईआर को भी प्रताड़ना की एक ऐसी गलती के रूप में याद करेगा, जिस पर चुनाव आयोग ने कार्यवाई करने के बजाय मीडिया के जरिए झूठ फैलाया था ।

​बीएलओज़ की मौत के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों पर तत्काल सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, और ‘गोदी/गटर मीडिया’ को इस जानलेवा साजिश में भागीदार बनने के लिए धिक्कारा जाना चाहिए। पत्रकारिता का धर्म सत्य दिखाना होता है, उसे बेचना नहीं।