रुतबे से रसगुल्ले तक — दीपक सक्सेना का ‘दीपोत्सवीय’ सफर!
कभी रोहना दरबार में नेताओं की कतार थी, आज वही नेता भाजपा दफ्तरों की चौखट पर मिठाई बांट रहे हैं… राजनीति ने वाकई दीप बदल दिए हैं।
✍️ संपादकीय: राकेश प्रजापति
कांग्रेस में दरबार, भाजपा में दरवाजे :
कभी दीपक सक्सेना का रोहना दरबार (बंगला) नेताओं के लिए ‘राजनीतिक तीर्थ’ था — जहां त्योहारों पर भीड़ लगती थी। आज वही नेता खुद दूसरों के घर जाकर शुभकामनाएँ दे रहे हैं।
राजनीति का यह दृश्य दिखाता है कि जब निष्ठा विचारधारा से नहीं, सत्ता से बंधी हो, तो सम्मान क्षणिक होता है।
कभी रोहना दरबार में नेताओं की भीड़ लगती थी, आज वही दीपक सक्सेना भाजपा नेताओं के घर-घर जाकर मिठाई बांट रहे हैं। यह नजारा सिर्फ राजनीति का रंग नहीं, बल्कि एक दौर के अंत और नए संघर्ष की कहानी है। कांग्रेस में रहते हुए सक्सेना का कद इतना ऊँचा था कि नेता उनके दरबार में हाजिरी लगाते थे — आज वही नेता सत्ता के गलियारों में ‘प्रवेश पत्र’ खोज रहे हैं।
दीपक सक्सेना का भाजपा में प्रवेश उस भरोसे के साथ हुआ था कि उन्हें सम्मानजनक भूमिका मिलेगी, लेकिन हकीकत में वे अब ‘संगठन के सिपाही’ बनकर रह गए हैं। भाजपा की भीड़ में उनका कद खो गया है, और कांग्रेस में जो भीड़ उनके आगे झुकती थी, अब पीछे से मुस्कुरा रही है। भाजपा की भीड़ में उनका कद बौना दिखने लगा है।
कांग्रेस में जो “कमलनाथ के बाद कमान संभालने वाले” माने जाते थे, आज वे अपने ही बेटे अजय सक्सेना के साथ पार्टी के जिलाई दौरों में मिठाई थमाते दिखाई दे रहे हैं। यह सत्ता परिवर्तन नहीं, साख का पतन है।
फोटो : साभार, दिव्य भारत समाचार
भाजपा की भीड़ में खोता चेहरा :
यह वही भाजपा है जो “कार्यकर्ता सर्वोपरि” का नारा देती है, लेकिन सवाल यह है कि जब कार्यकर्ता की जगह अवसरवादियों की फेहरिस्त बढ़ेगी, तो असली निष्ठावान कहां जाएंगे ? दीपक सक्सेना जैसे अनुभवी नेता अब मिठाई के डिब्बों में राजनीतिक संदेश पैक कर रहे हैं, शायद यही नए युग की राजनीति है — जहां विचारधारा से ज़्यादा जरूरी है ‘विजेता के पाले’ में होना।
भाजपा में आज नेताओं की भीड़ है — विचारधारा कम, अवसरवाद ज़्यादा। ऐसे में पुराने कांग्रेसियों की भूमिका सीमित होना तय है।
दीपक सक्सेना की कहानी उन नेताओं के लिए सबक है जो सोचते हैं कि पार्टी बदलने से किस्मत भी बदल जाएगी।
संगठन के भीतर संघर्ष करना शायद अब उनका नया राजनीतिक अध्याय होगा।
राजनीतिक ‘रंग बदलने’ की कीमत :
कांग्रेस में दीपक सक्सेना “कमलनाथ के बाद सबसे बड़ा चेहरा” थे, पर भाजपा में वे अब अपने ही बेटे अजय सक्सेना की छाया में खड़े हैं। जो कभी रुतबे की मिसाल थे, वे अब अस्तित्व की तलाश में हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं — यह उस राजनीति की दास्तान है जहां निष्ठा की कीमत सत्ता तय करती है, और हर दीपावली पर पुराने दीप बुझ जाते हैं ताकि नए चेहरे चमक सकें।
निचोड़ : राजनीति में अब निष्ठा नहीं, समीकरण चलते हैं। दीपक सक्सेना का यह दीपोत्सव हमें याद दिलाता है कि जब दीप बदल जाते हैं, तो रोशनी भी वैसी नहीं रहती। राजनीति का यह दृश्य जितना चमकीला दिखता है, उतना ही भीतर से तीखा भी है। कांग्रेस में जिनके दरबार में नेता हाजिरी लगाते थे, वे आज सत्ता के गलियारों में “अपना स्थान” तलाश रहे हैं। कभी जो रोशनी का केंद्र थे, आज वही अपनी लौ बचाने में व्यस्त हैं।
दीपक सक्सेना का राजनीतिक सफर :
दीपक सक्सेना के राजनीतिक करियर के मुख्य पड़ाव सार रूप से दिए गए हैं : —
| वर्ष/ अवधि | पद एवं विवरण |
|---|---|
| ~1970 | ग्राम पंचायत सरपंच , रोहना (छिंदवाड़ा जिले) के रूप में शुरुआत। |
| 1975-1980 | रोहना ग्राम पंचायत/सरपंच के रूप में पुन: कार्य। |
| 1984 | जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, छिंदवाड़ा के अध्यक्ष नियुक्त। |
| 1993 | छिंदवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। |
| 1998 | उक्त विधानसभा क्षेत्र से दूसरी बार विधायक चुने गए। |
| 2003-2008 | इस अवधि में विधानसभा चुनाव में पराजय + पुनः प्रत्याशी बने |
| 2008 | छिंदवाड़ा से वापस विधायक चुने गए | |
| 2018 | छिंदवाड़ा विधानसभा से फिर से विधायक बने, लेकिन फरवरी 2019 में इस्तीफा देकर स्थान खाली किया। |
| 2018-19 | इस्तीफे के बाद कमलनाथ को छिंदवाड़ा से प्रस्तावित उम्मीदवार बनाया गया। |
| दो बार मंत्री | मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार के दौरान उन्होंने मंत्री की भूमिका निभाई — दो बार मंत्री बने। |
| विधान सभा प्रो टेम स्पीकर | 2018 बाद विधायक पद छोड़ने से पूर्व उन्हें विधानसभा में प्रो टेम स्पीकर बनाया गया था। |
| मार्च–अप्रैल 2024 | कांग्रेस से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुए। |
कुछ टिप्पणी‐बिंदु
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उन्होंने लगभग 20 साल तक सहकारी बैंक अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।
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उनके कांग्रेस में लंबे समय (लगभग 40-45 वर्ष) शामिल रहने के बाद भाजपा में जाना एक बड़ा राजनीतिक बदलाव माना गया।
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उनके करियर से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने स्थानीय राजनीति से शुरुआत की, फिर सहकारी क्षेत्र में स्थापित हुए, विधायक व मंत्री पद पर रहे, और अंततः पार्टी परिवर्तित की।