मिलावटखोरी पर कार्रवाई या अवैध वसूली का त्यौहार ?
विशेष टिप्पणी : राकेश प्रजापति
जिले में हर साल त्योहारी मौसम आते ही खाद्य निरीक्षक सक्रिय दिखाई देने लगते हैं। जानकार बताते है कि दुकानों, मिठाई के ठेलों और होटलों पर नमूने लिए जा रहे हैं, फोटो खिंचवाए जाते हैं, और कुछ दिनों तक “मिलावटमुक्त अभियान” की गूंज सुनाई देती है। लेकिन जैसे ही दीपावली या अन्य पर्व समाप्त होते हैं, पूरा विभाग फिर सालभर की गहरी नींद में चला जाता है। सवाल उठता है — क्या यही सरकार का “मिलावट से मुक्ति अभियान” है, या फिर यह नमूने लेने के नाम पर अवैध वसूली का मौसमी उत्सव बन चुका है ?
खाद्य एवं औषधि विभाग छिंदवाड़ा की स्थिति इसका जीता-जागता उदाहरण है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक पिछले पाँच वर्षों में कुल 366 नमूने लिए गए हैं, जिनमें से लगभग 70 प्रतिशत मामलों की रिपोर्ट अब तक लंबित है। यानी वर्षों बाद भी विभाग को यह नहीं पता कि जिले में बिक रही मिठाइयाँ, तेल, घी या मसाले शुद्ध हैं या जहरीले।
इतना ही नहीं, रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जनवरी 2020 से अब तक 10 हज़ार से अधिक खाद्य नमूने राज्यभर से भेजे गए, लेकिन छिंदवाड़ा जिले में अब भी लगभग 2 हज़ार नमूनों की रिपोर्ट लंबित है। इसका मतलब यह हुआ कि जिन व्यापारियों के नमूने जांच में गए हैं, वे या तो बेफिक्र हैं या फिर रिपोर्ट आने से पहले ही सब कुछ “मैनेज” कर चुके हैं।
सूत्र बताते हैं कि अब तक 8 हज़ार से अधिक मामलों में 368 रिपोर्टें मिलीं, जिनमें से 50 प्रतिशत खाद्य पदार्थ मानकों पर खरे नहीं उतरे। 17 मामलों में FIR दर्ज हुई, 5 व्यापारियों का लाइसेंस निरस्त किया गया, और लगभग 10 लाख रुपये का जुर्माना वसूला गया। लेकिन यह कार्रवाई न के बराबर है, क्योंकि जिले में हजारों दुकानों और प्रतिष्ठानों में मिलावटखोरी का व्यापार अब भी खुलेआम फल-फूल रहा है।
जनता पूछ रही है — जब रिपोर्टें वर्षों तक पेंडिंग रहती हैं, तो विभाग के अधिकारी करते क्या हैं ? क्या यह वही अफसर हैं जो त्योहारों पर नमूने लेकर “चांदी की चमचों से रिश्वत की चाशनी चाटते” हैं, और बाकी साल अपने एसी कमरों में फाइलों का बोझ ढोते रहते हैं?
खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी जिस विभाग पर है, वही अगर भ्रष्टाचार और लापरवाही में डूबा रहेगा तो “मिलावट से मुक्ति” का नारा सिर्फ़ कागज़ पर ही रह जाएगा। वर्षों से एक ही कुर्सी पर जमे अधिकारी अब विभाग के लिए बोझ बन चुके हैं।
विभागीय लापरवाही की भेंट चढ़े मासूम
हाल ही में जहरीले कफ सिरप के सेवन से 24 मासूम बच्चों की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। यह त्रासदी भी इसी तरह की विभागीय लापरवाही का नतीजा है। जब निरीक्षण और जांच केवल दिखावे के लिए की जाएगी, तब ऐसी घटनाएं होना तय है।
जनता के पैसों से पल रहे ‘नौकरशाह’ कब जागेंगे ?
त्योहारों के बाद खाद्य निरीक्षक और अधिकारी फिर सालभर के लिए अपने कमरों में कैद हो जाते हैं। न तो जांच की गति बढ़ाई जाती है, न ही दोषियों पर ठोस कार्रवाई होती है। सवाल जायज है कि — क्या ये अधिकारी जनता की सुरक्षा के लिए हैं या केवल त्योहारों पर उगाही के लिए ?
अब वक्त आ गया है कि सरकार और प्रशासन दोनों यह तय करें कि मिलावट से मुक्ति अभियान केवल कागज़ों तक सीमित रहेगा या ज़मीन पर भी उतरेगा। जनता अब भी इंतजार में है कि इन चांदी की चमचों से रिश्वत की चाशनी चाटने वाले अफसरों की नींद कब टूटेगी…
सरकार को चाहिए कि इन अधिकारियों की कार्यप्रणाली की जांच उच्च स्तरीय समिति से कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ये अभियान जनता की सेहत बचाने के लिए चलाए जाते हैं या अपनी जेबें गर्म करने के लिए।
अब समय आ गया है कि खाद्य विभाग की सफाई खुद शुरू की जाए — तभी जनता मिलावट से सचमुच मुक्त हो सकेगी।