रचित ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा श्रीमद्भगवतगीता का भावानुवाद किया है ! श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को ‘श्रीकृष्णार्जुन संवाद में मात्र 697 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। गीता के समस्त अठारह अध्यायों का डॉ. बुधौलिया ने गहन अध्ययन करके जो काव्यात्मक प्रदेय हमें सौंपा है, वह अभूतपूर्व है। इतना प्रभावशाली काव्य-रूप बहुत कम देखने को मिलता है। जिनमें सहज-सरल तरीके से गीताजी को समझाने की सार्थक कोशिश की गई है।अठारहवाँ अध्याय : मोक्ष-सन्यास योग
दुःखदायी कर्मों से अर्जुन, जो पुरुष न रखता द्वेष कभी,
सुखदायी कर्मों में उसकी, हे पार्थ नहीं आसक्ति रही।
सतगुण में सुस्थित रहता, जो सुस्थिर मति जो निज कर्म करें,
उसके मन में न कर्म विषयक, संशय कोई कदापि उपजे।-10
सम्पूर्ण रूप से त्याग नहीं, कर्मो का कोई कर सकता,
यह देहबद्ध है जीव पार्थ, जो कर्मो से बंधकर चलता।
इसलिये त्याग केवल फल का, कर पाने का वह अधिकारी,
कर्मो का नहीं त्याग फल का, फल का त्यागी सच्चा त्यागी।-11
कर्मों के फल का त्याग नहीं, कर पाते जो बँध जाते,
सुख-दुख या दोनों का मिश्रण, जीवों के बाँटे में आते,
ये तीन कर्मफल होते हैं, मरने पर जीव जिन्हें पाता,
पर जिसने फल का त्याग किया, वह सुख दुख में न उलझ पाता।-12
कारण है पाँच महाबादो, सब कर्मो की जो पूर्ति करे,
बतलाता जिन्हें सांख्य दर्शन, अर्जुन इस तरह उन्हें समझे।-13
आधार कर्म का अधिष्ठान, होता शरीर कर्ता-प्राणी इन्द्रियाँ करण,
बहु चेष्ठायें, अरू प्रेरक प्रभु अन्तर्यामी।-14 क्रमशः ….