‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 125..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 125 वी कड़ी ..

                   एकादशोऽध्यायः ‘विश्व रूप दर्शन योग’

         अध्याय ग्यारह – ‘भगवान का दिव्य रूपान्तर’

श्लोक   (२७)

योद्धागण देव हमारे भी, बढ़ रहे वेगपूर्वक मुख में,

वे नहीं दीखते कहाँ गए, जो समा गए जाकर मुख में ।

कुछ सीधे मुख में समा रहे, कुछ दाँतो से पीसे जाते

कुछ शीशचूर्ण के साथ पगे, दाँतों में फँसकर रह जाते ।

 

मुँह में लय होती दीख रही, योद्धाओं की कतार भारी,

दोनों पक्षों के वीरों से, रक्षित रण की सेना सारी ।

मैं देख रहा हूँ,, बड़े वेग से, दौड़ समाते वे मुख में,

कुछ फँसे दाँत में, चिगले कुछ, कुछ पिसते जाते हैं मुख में।

 

आकृति विकराल भयानक प्रभु, उस पर दाढ़ें भीषण दारुण,

छुटकारा नहीं मरण से है, जिसने भी पाया है जीवन ।

कुछ मृत्यु वरण करते हँसकर, कुछ कष्ट उठाकर मरते हैं,

कुछ बुरी दशा को प्राप्त हुए, दाँतों में फँसेब तड़फते हैं

श्लोक  (२८)

सागर की ओर बहा करता, ज्यों जल प्रवाह सरिताओं का,

रोके से रुकता नहीं वेग, ऐसी उनकी स्वाभाविकता ।

रण शूरवीर सब उसी भाँति, मुख में प्रवेश पाने बढ़ते,

तदरूप हुए भीतर जाकर, जिनमें प्रवेश योद्धा करते ।

श्लोक  (२९)

मैं देख रहा ये सबके सब, अति वेग सहित बढ़ रहे स्वयं,

अपने विनाश की ओर सहज, पाने प्रवेश मुख में भगवन ।

वैसे ही ज्यों प्रज्जवलित अग्नि-की ओर पतिंगे उड़ आवें,

अति वेग सहित उससे मिलने, मिलकर जिससे वे जल जावें।

 

तज नाम रुप जन शूरवीर, तेरे स्वरुप को पा जाते,

पर पड़े मोह में जो रहते, वे शलभों जैसे जल जाते ।

स्वाभाविक वेग नदी का है, जो सागर को पाने बढ़ती,

पर शलभों के जलने में उनकी, मोह जन्य इच्छा पलती ।

श्लोक  (३०)

मैं देख रहा उनका विनाश जो बढ़ते हैं सवेग मुख में,

मोहान्ध पतिंगों जैसे वे, जलकर मर जाते हैं मुख में ।

प्रज्जवलित मुखों से हे भगवान, लोकों को ग्रास बनाए हैं,

सम्पूर्ण जगत को तेज-ताप से भगवन बहुत तपाए हैं।

 

हे विष्णो ! देख रहा हूँ मैं, ग्रस रहे लोक सम्पूर्ण आप,

अरु चाट रहे हैं लोकों को, प्रज्जवलित मुखों से हे विराट ।

अति उग्र प्रकाश रहा भगवन, ब्रह्माण्ड विभाषित है इससे,

परिपूर्ण तेज से जगत रहा, तपता रहता नित जग उससे

 

अति उग्र रुप भयकारी यह, फैले दिशि-दिशि में मुख अपार,

अति तीव्र अग्नि से उदर भरे, मुख से निकलें लपटें कराल ।

चौदह भुवनों को निगल रहे, जिव्हा अतृप्त लपलता रही,

इस तरह प्रकाश का उग्र तेज, सन्तप्त जगत, सन्तप्त मही ।

श्लोक  (३१)

देवाधिदेव हे कृपासिन्धु, हैं कौन आप अति उग्र रुप?

करता प्रणाम तुमको भगवन, मुझ पर प्रसन्न हों, विश्वरुप ।

हैं कौन आप? यह जान सकूँ, मन में जागी प्रभु अभिलाषा,

क्या रहा प्रयोजन? क्या प्रवृत्ति ? भगवन मैं समझ नहीं पाता ।

 

कुरुक्षेत्र युद्ध के वीरों को, क्यों मुँह में जाते दिखलाया?

है क्या रहस्य इन दृश्यों का, भगवन मैं समझ नहीं पाया?

क्या निकट भविष्य में होना है, इसका न ज्ञान मुझको भगवन ?

क्यों उग्र रुप यह दर्शाया, कारण इसका क्या है भगवन ? क्रमशः…