पत्रकारिता की आड़ में उगाही-लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सबसे बड़ा हमला ..
संपादकीय: राकेश प्रजापति
छिंदवाड़ा में कथित पत्रकारों द्वारा एक निजी अस्पताल संचालक को खबर प्रकाशित करने की धमकी देकर अवैध उगाही करने का मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस भयावह सच्चाई का आईना है, जिसमें पत्रकारिता का पवित्र पेशा कुछ असामाजिक और अवसरवादी तत्वों के कारण बदनामी के दलदल में धकेला जा रहा है। यह घटना एक गंभीर चेतावनी है कि यदि समय रहते इस पर कठोर नियंत्रण नहीं किया गया, तो समाज का भरोसा पत्रकारिता से पूरी तरह उठ सकता है।
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है – एक ऐसा स्तंभ, जिसका दायित्व सत्ता से सवाल पूछना, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और जनता के अधिकारों की रक्षा करना है। लेकिन जब इसी पवित्र जिम्मेदारी को कुछ लोग अवैध वसूली का हथियार बना लें, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। खबर को हथियार बनाकर भय पैदा करना और फिर उस भय का सौदा करना, यह कृत्य किसी भी दृष्टि से पत्रकारिता नहीं, बल्कि संगठित अपराध की श्रेणी में आता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसे तथाकथित पत्रकार बिना किसी रोक-टोक के समाज में सक्रिय हैं। इसका सीधा संकेत प्रशासनिक शिथिलता और लापरवाही की ओर जाता है। जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है कि वे पत्रकारिता के नाम पर सक्रिय व्यक्तियों और संस्थानों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करें। लेकिन हकीकत यह है कि इस दिशा में कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। परिणामस्वरूप, कोई भी व्यक्ति एक फर्जी आईडी कार्ड या छोटे-मोटे पोर्टल के सहारे खुद को पत्रकार घोषित कर लेता है और फिर अपने स्वार्थ के लिए इस पहचान का दुरुपयोग करता है।
यह स्थिति वास्तविक और ईमानदार पत्रकारों के लिए भी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। वर्षों की मेहनत, प्रतिबद्धता और नैतिक मूल्यों से अर्जित पत्रकारिता की साख, ऐसे कुछ ‘काली भेड़ों ’ के कारण संदिग्ध नजर आने लगती है। समाज में जब पत्रकार की पहचान भय और अविश्वास का कारण बनने लगे, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरे की घंटी है।
अब समय आ गया है कि इस समस्या पर आधे-अधूरे उपायों की बजाय निर्णायक और कठोर कार्रवाई की जाए। प्रशासन को चाहिए कि फर्जी पत्रकारों और संदिग्ध मीडिया संस्थानों की व्यापक जांच कर उनकी गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाए। साथ ही, पत्रकार संगठनों को भी आत्ममंथन करते हुए ऐसे तत्वों का खुलकर विरोध करना होगा, क्योंकि मौन रहना भी इस अपराध को अप्रत्यक्ष समर्थन देने के समान है।
पत्रकारिता कोई व्यवसाय मात्र नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व और सामाजिक विश्वास है। इसे बदनाम करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए। यदि आज इन काली भेड़ों को नहीं रोका गया, तो कल पत्रकारिता की पहचान ही संदेह के घेरे में होगी। यह लड़ाई केवल कानून की नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा को बचाने की लड़ाई है—और इसे हर हाल में जीतना ही होगा।