बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी भी उन्हीं की तरह एक रहस्य हैं. यहां होने वाले रस्मों रिवाज पूरे भारत से अनोखे ही नहीं रहस्य्मय हैं, जहां एक तरफ होली पर यहां के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर रंग की जगह चिता की राख लगाना अपने आप में अनोखा है तो वहीं वासन्तिक नवरात्रे में तवायफों द्वारा ये टोटके भी दूसरी रस्मों से एक दम जुदा  है. यहां के रिवाज ही भोलेनाथ की इस नगरी को औरों से अलग दिखाती पड़ते है.

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर नवरात्रे  की सप्तमी पर तवायफें ठुमके लगाती हैं. यहां नाचने का मतलब भले ही मोक्ष की सत्यता से जुड़ा हुआ एक दर्शन हो लेकिन लोकाचार में एक मान्यता भी जुड़ी हुई है. सैकड़ों साल पुरानी मान्यता है कि श्मसान घाट पर बासंतिक नवरात्रे  की सप्तमी को बाबा मशाननाथ की दर पर तवायफें इसलिए नाचने आती है क्योंकि यहां नवरात्रे में नृत्य करने से अगले जन्म में इस नारकीय जीवन से छुटकारा मिल जाता है.

यह आयोजन कोई छोटा-मोटा नहीं आता इसे पूरी धूमधाम से मनाया जाता है. इसके लिए बाकायदा चिताओं के बीच में एक स्टेज लगाया जाता है साजिंदे भी आते हैं और कद्रदान भी पूरी रात बैठकर नृत्य का आनंद उठाते हैं. बताया जाता है कि ये तवायफें बिना किसी पारितोषिक के यहां नृत्य करती हैं. क्योंकि वे अगले जन्म में फिर से तवायफ के रूप में जन्म नही लेना चाहती हैं.