सियासत में किनारे हुए या अनंत में विलीन , मंदिर-मस्जिद आंदोलन से जुड़े चेहरे..

आखिरकार दशकों की मशक्कत, जोर आजमाइश, संघर्ष और आंदोलन के बाद अयोध्या विवाद पर शीर्ष अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है। पांच न्यायधीशों की पीठ ने एकमत से विवादित जमीन पर भगवान राम को मालिकाना हक दे दिया है। इस विवाद के 70 साल बाद राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के समर्थन और विरोध के कारण चर्चा में आईं नामचीन हस्तियां या तो अनंत में विलीन हो गईं, या सियासत से दूर हो गईं।मस्जिद के पक्ष में दशकों संघर्ष करने वाले हामिद अंसारी, सैयद शहाबुद्दीन  तो मंदिर के पक्ष में आंदोलन की अगुवाई करने वाले महंत रामचंद्रदास परमहंस, संघ प्रमुख रहे केसी सुदर्शन, अशोक सिंघल, देवराहा बाबा, महंत अवैद्यनाथ अब इस दुनिया में नहीं है। विवादित परिसर का ताला खुलवाने वाले तत्कालीन पीएम राजीव गांधी, बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान पीएम रहे नरसिंह राव भी अनंत में विलीन हो गए। 

मंदिर के पक्ष में आंदोलन खड़ा करने वाले लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती अब संसदीय राजनीति से दूर हैं तो आडवाणी की रथयात्रा रोकने वाले बिहार के पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाले में सजा के बाद राजनीतिक करियर खत्म हो गया है।

मुस्लिम पक्ष के चर्चित चेहरे….

हामिद अंसारी :- साल 1949 से ही बाबरी मस्जिद के सबसे प्रमुख पैरोकार रहे हामिद अंसारी का 95 साल की आयु में 20 जुलाई 2016 को निधन हो गया था। पहले साइकिल फिर दर्जी की दुकान खोलने वाले अंसारी 1961 में बाबरी मस्जिद के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से दायर मुकदमे में मुद्दई थे। अंसारी ने ही 1986 में राजीव सरकार द्वारा ताला खोलने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में मुकदमा किया। उनकी राम मंदिर के पैरोकार परमहंस रामचंद्र दास से दोस्ती हमेशा चर्चा में रही।

सैयद शहाबुद्दीन :- भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी से राजनेता बने सैयद शहाबुद्दीन ने बाबरी मस्जिद के मुख्य पैरोकारों में से थे। इसे धार्मिक की जगह कानूनी मुद्दा मानने वाले शहाबुद्दीन ने मजिस्द निर्माण के लिए बाबरी मस्जिद कोऑर्डिनेशन कमेटी बनाई। ताला खोलने के खिलाफ गणतंत्र दिवस के बहिष्कार की घोषणा की। तीन बार सांसद रहे शहाबुद्दीन ने ताला खोलने के विरोध में संसद के 41 मुस्लिम सांसदों के साथ तत्कालीन पीएम राजीव गांधी से मुलाकात कर बाबरी मस्जिद मुसलमानों को सौंपने की मांग की थी।

हिंदू पक्ष के चर्चित चेहरे….महंत रामचंद्रदास परमहंस :- मुस्लिम पक्ष में हामिद अंसारी तो हिंदू पक्ष के महंत रामचंद्र दास परमहंस ही वर्ष 1949 में विवाद शुरू होने और वर्ष 1992 में बाबरी ढांचा के विध्वंस होने मुख्य भूमिका में रहे। कभी हिंदू महासभा से जुड़े रहे और परमहंस 1989 में गठित राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष बने। राम मंदिर निर्माण के लिए दिल्ली में 1984 में हुए धर्मसंसद की भी अध्यक्षता की। उन्हीं की अध्यक्षता में जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। उनका निधन 2003 में हुआ। अंत समय तक राम मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष करते रहे।

अशोक सिंघल ;- संघ के अनुषांगिक संगठन विहिप के मुखिया रहे अशोक सिंघल ने राम मंदिर आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाई। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में उन्हीं की अगुवाई में हुए शिला पूजन, दिल्ली में धर्मसंसद, विराट हिंदू सम्मेलनों ने राम मंदिर आंदोलन को नई धार दी। बाद में बाबरी ढांचा विध्वंस मामले में सिंघल आरोपी भी बने।

देवराहा बाबा :- राम मंदिर आंदोलन को धार देने वालों में देवराहा बाबा प्रमुख चेहरा थे। इलाहाबाद में जनवरी 1984 में हुई उस धर्मसंसद की अध्यक्षता देवराहा बाबा ने की जिसमें 9 नवंबर 1989 को राम मंदिर के शिलान्यास की तारीख तय हुई थी। सभी बड़ी राजनीतिक हस्तियां इनकी भक्त थीं। कहा जाता है कि इन्हीं के आदेश के बाद तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने तमाम विरोध के बावजूद विवादित स्थल का ताला खुलवाया।

महंत अवैद्यनाथ :- राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति केपहले अध्यक्ष महंत अवैद्यनाथ ने भी राम मंदिर आंदोलन को धार देने में अहम भूमिका निभाई। मंदिर निर्माण के लिए राम जन्मभूमि न्यास के भी अध्यक्ष रहे। उन्होंने इससे जुड़े आंदोलनों में सक्रिया भूमिका निभाई। बाद में बाबरी ढांचा विध्वंस मामले में इन्हें मुख्य आरोपी बनाया गया।

सक्रिय राजनीति से दूर आंदोलन के हीरो.. लालकृष्ण आडवाणी :- राम मंदिर निर्माण को राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बनाने में लालकृष्ण आडवाणी ने अहम भूमिका अदा की। वह आडवाणी ही थे जिन्होंने विहिप की ओर से शुरू किए गए आंदोलन को राजनीतिक आंदोलन बनाया। सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा निकाल कर इस आंदोलन को राजनीतिक मुद्दा बनाया। इसी आंदोलन की बदौलत भाजपा की ताकत बढ़ाई। विवादस्पद ढांचा विध्वंस मामले में आरोपी बनाए गए। वर्तमान में आडवाणी सक्रिय राजनीति से दूर हैं।

कल्याण सिंह :- विवादास्पद ढांचा विध्वंस के दौरान यूपी के सीएम रहे कल्याण सिंह की छवि हिंदू हृदय सम्राट की बनी। सीएम नहीं रहते हुए भी उन्होंने मंदिर आंदोलन में लगातार अहम भूमिका निभाई। वर्ष 1992 में सुप्रीम कोर्ट को विवादित ढांचे की सुरक्षा का हलफनामा दिया। विवादित ढांचा टूटने के बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई। कल्याण बाद में भी यूपी के सीएम बने। फिर उनका भाजपा से आना जाना लगा रहा। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में राज्यपाल बनाए गए। फिलहाल सक्रिय राजनीति से दूर हैं।

मुरली मनोहर जोशी :- भाजपा का प्रमुख चेहरा रहे मुरली मनोहर जोशी ने भी इस आंदोलन में अहम भूमिका निभाई। आडवाणी की तरह विवादास्पद ढांच विध्वंस मामले में आरोपी बनाए गए। अब आडवाणी की तरह ही सक्रिय राजनीति से दूर हैं।

उमा भारती :- राम मंदिर आंदोलन के दौरान साध्वी उमा भारती जनसभाओ में विहिप और भाजपा की मुख्य वक्ताओं में थी। वर्ष 1990 में 1992 के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। विवादास्पद ढांचा विध्वंस मामले में आरोपी उमा बाद में वाजपेयी और मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री बनी। फिलहाल खुद संसदीय राजनीति से दूर हैं।

आंदोलन विरोधी चेहरे.. लालू प्रसाद यादव :- बिहार का सीएम रहते लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा सीतामढ़ी में रोक दी थी। आडवाणी को गिरफ्तार करा दिया था। मंदिर आंदोलन के मुखर विरोधी लालू प्रसाद फिलहाल चारा घोटाला मामले में जेल में बंद हैं।

मुलायम सिंह यादव :- यूपी का सीएम रहते वर्ष 1990 में कारसेवकों पर गोली चलवाने का आदेश देने वाले मुलायम सिंह को बाद में भी सीएम बनने का मौका मिला। सपा यूपी में लगातार मजबूत हुई। हालांकि बीते विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सपा को सत्ता गंवानी पड़ी। वर्तमान में मुलायम की यूपी की सियासत में पुराना दबदबा नहीं रहा।

राजीव गांधी :-  साल 1986 में जब तत्कालीन पीएम राजीव गांधी ने विवादित स्थल का ताला खुलावाया तो इसे कांग्रेस के नरम हिंदुत्व का नाम दिया गया। हालांकि इस निर्णय के बाद कांग्रेस न सिर्फ यूपी में लगातार कमजोर होती गई, बल्कि मुस्लिम वर्ग में भी कांग्रेस का आधार लगातार कमजोर होता चला गया। उन्हें 1989 के लोकसभा चुनाव में सत्ता गंवानी पड़ी। इसके दो साल बाद 1991 में उनकी लिट्टे आतंकवादियों ने हत्या कर दी।

पीवी नरसिंह राव :- विवादित ढांचे के विध्वंस के दौरान पीवी नरसिंह राव देश के पीएम थे। इस घटना के बाद राव अपनी ही पार्टी के नेताओं के निशाने पर आए। ताला खुलवाने के बाद विवादित ढांचे को कारसेवकों द्वारा गिरा दिए जाने से मुस्लिम वर्ग ने गैरभाजपा-गैरकांग्रेस विकल्प का समर्थन करना शुरू किया। बाद में राव भी पार्टी से किनारे कर दिये गए। कांग्रेस से उनकी दूरियां इतनी बढ़ी कि उनके निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को पार्टी मुख्यालय में रखने की इजाजत नहीं दी………………..साभार :- अमर उजाला 

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