आस्था के आसरे संरक्षित जीवन दायनी माँ गंगा……

कभी-कभी भ्रम होता है इन पर्वतों ने कहीं आसमान को थाम तो नहीं रखा है, आसमान से गुफ्तगू करते इन पहाड़ी अंचलो में कई खूबसूरत चमचमाती झीलें भी है जो अनायास ही पर्यटकों का मन मोह लेती है..

          गगनचुंबी पर्वतों को देखकर यह अहसास होता है कि कहीं आसमान तो इन पर नहीं झुक गया है या फिर इन पर्वतों ने कहीं आसमान को थाम तो नहीं रखा है आसमान से गुफ्तगू करते इन पहाड़ों के अंचल में कई खूबसूरत धवल चमचमाती झीले भी है और खतरनाक दर्रे भी कहीं बर्फ के नजारे हैं तो कहीं हरियाली का आलम , प्रकृति के तमाम विविधताओं से भरपूर इस घाटी में कदम रखते ही सैलानियों के मुख से सहसा निकलता है अद्भुत ! अप्रीतम और बेमिसाल …………व्याख्या कर रहे है राकेश प्रजापति 

इस घाटी का नाम है गड्वाल ,गंगोत्री उत्तराखंड जो अपने आप में देवभूमि है दुर्गम क्षेत्रों में स्थित यह घाटी अपने आगोश में कई खतरनाक ग्लेशियर , दर्रे , झीलें और उस हिम नदियां समेटे हुए है।गंगोत्री .. मां गंगा का उद्गम स्थान ! जिसे भूगोल वेताओं के अनुसार समुद्रतल से  गंगीत्री 30′ 59’39,666″ N अक्षांश 78′ 56’28,296″E पर 3056 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है । यहां पहुंचे वाले पर्यटक  500 मीटर दूरी पर सूर्यकुंड 21 मीटर दूरी पर भागीरथ शीला तथा डेढ़ किलोमीटर दूरी पर स्थित पांडव गुफा आसानी से पहुंच सकते हैं। वहीं 19 किलोमीटर पर गोमुख ग्लेशियर है जहां पहुंचना आसान नही है यही वह ग्लेशियर है जहां से गंगा का उद्गम स्थान माना जाता है ।

      भारत बर्ष में गंगा जी को माँ के समान माना गया है माँ जैसे अपने बच्चों को जिस तरह पालित पोषित करती  है और उसके सभी गुनाहों पर परदा डालते हुए अन्य बच्चों की तरह चाहती  है उसकी ममता में किसी प्रकार का छल-कपट नही होता है ! उसी रूप में गंगा नदी का भारत बर्ष में भी मान सम्मान और महिमा से अनेको ग्रंथ भरे पड़े हुए है ! उनके उद्गम ओर अवतरण को लेकर भी भारतीय धर्मग्रंथो में अनेको कहानियां,  किवदंतिया औऱ कथाएं भरी पड़ी है । हम इस मीमांसा में अगर पड़े तो उलझते ही चले जायेंगे । इसलिए माँ गंगा के जीवन दायनी , पापहारणी ओर मोक्ष प्रदान करने बाले जल पर चर्चा करेंगे ! क्योंकि जल का कितना माहत्य है यह किसी से छिपा नही है ! बाबजूद इसके लोग प्रक्रति से छेड-छाड़ करने से बाज नही आ रहे है , जल .जंगल और जमीन के बिना हमारा अस्तित्व ही नही है फिर भी सम्पूर्ण मानव जाति इन प्राकर्तिक उपहारों से छड़ने , लूटने ओर नष्ट करने से बाज नही आ रही है ! इसकी परिणीति आज हमें देखने को मिल रही है ! एक ही मौसम ने कही- कहीं भारी बारिश तो दूसरी ओर भयंकर सूखे से लोग बूँद बूँद पानी के आभाब ने तड़प तड़प कर अपनी जान गंवा रहे है । इसे फिर हम प्राकृतिक आपदा या फिर जलवायु परिवर्तन का नाम दे , इससे कोई फर्क नही पड़ता है ।
जल के महत्व को हमारे ऋषिमुनियों में हजारो साल पहले ही वर्णित कर दिया था फिर गंगा जल की तो बात ही निराली है ! प्राचीन ग्रंथ “भोजन कौतूहल ग्रंथ ” के अनुसार * शीतम स्वादु स्वच्छमत्यन्तरुच्यं तथ्यां पाकयं पचनं पापहारी ।
तृष्णा मोह ध्वंसन’ दीपन’ च प्रज्ञानं धत्ते वारी भगीरथीयम ।।। 
    इसका अर्थ है गंगा जल श्वेत , स्वाद , स्वच्छ, अन्यन्त रुचिकर, ठंडा ,पथ्य, भोज्य पकाने योग्य, पाचक ,प्यास मिटाने बाला एवं क्षुधा औऱ बुद्धिवर्धक है ।अतः यह बात सर्वमान्य है कि जितने गुण गंगाजल में है, इतने अन्य किसी भी नदी के जल में नही पाए गए है ।
     आज से दो हजार वर्ष पूर्व महर्षि चरक की मान्यता है कि – * हिम्वतप्रभवा: पथ्य * इसका तात्पर्य यह है कि महर्षि चरक ने भी गंगा के जल को पथ्य माना है ! नवी शताब्दी में हुए वागभट्ट ने इसी तथ्य मैं निम्न शब्दों के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है कि – * लक्षण हिमालयभवतवादव गांग पथ्यम *।
                   आयुर्वेद के मतानुसार नर्मदा का जल तरुणय को स्थाई रखने वाला और गंगाजल रोगों का शमन करने वाला कहा गया है । गंगा की महिमा को चिरस्थाई बनाए रखने में सबसे अधिक योगदान गंगाजल का ही है। गंगाजल का पान सर्वपापहारी है यह तो सनातन वाक्य है पर गंगाजल रोगहारी है, इससे भी संदेह नहीं है । गंगाजल के स्वास्थ्य संबंधी कारणों के कारण ही वृद्धावस्था में इसका सेवन अमृत्तुल्य माना गया है ।
    छान्दोग्य उपनिषद में नाड़ियों के शुक्ल, नील, पीत आदि वर्णो का वर्णन है । प्रश्नोपनिषद में मानव संरचना को समझाते हुए उनकी संख्या 72 करोड़ ,72 लाख,10 हजार दौ सौ एक ( 72,72,10,201) बताई जाती है ।मस्तिष्क को नाड़ी केंद्र माना गया नाड़ियों के संगम को तीर्थराज कहते है ठीक इसी तरह नाड़ियों की साधना ही त्रिवेणी स्नान माना है। इनमे ईड़ा नाड़ी को गंगा , पिंगला नाड़ी यमुना और सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती माना गया है । साधक जब कुंडलिनी जागृत करता है तो उसे प्राणान्त वेदना सहन करनी होती है ! तब वह मनु के पुत्र चंद्रमा और सहस्त्र दल से पैदा हुए त्रिवेणी धारा गंगा नदी आदि धवल कर उठती हुई कुंडलिनी की ज्वाला का शमन करता है । अतः हठयोग की परंपरा में जिन-जिन साधकों योगियों ऋषि-मुनियों ने जो कुछ भी रचा उसमें सर्वत्र गंगा जी की महिमा इडा नाड़ी का चमत्कार ही बताया गया है।
भारतीय जनमानस में गंगा नदी का अपार सम्मान है ! गंगा नदी का ऋण प्रत्येक धार्मिक भारतीय तो मानता ही है परंतु कोई नास्तिक भी  उसे अस्वीकार नहीं कर सकता। क्योंकि भौगोलिक दृष्टि से गंगा नदी ने उत्तर भारत को समृद्ध बनाया है ! अनगिनत वर्षों से उपजाऊ मिट्टी ढो- ढोकर उत्तरी भारत का दोआबा बना , जिस पर जनजीवन पनपा और निरंतर उसे पेयजल के रूप में पानी मिलता रहा है ।
                     भारत जैसे एक कृषि प्रधान देश को बनाने में गंगा नदी का सबसे अधिक महत्व है यदि  यह अगाध जल राशि प्रदान करने वाली गंगा नदी न होती तो उत्तर भारत एक बहुत बड़ी खाई होता संभवतः वीरान रेगिस्तान। गंगाजल वास्तविक रूप में चमत्कारिक है, इसे वर्षों तक रखा जा सकता है और यह खराब नहीं होता है । गंगाजल में कृमिनाशक गुण है , इस जल से क्षय रोग , प्लेग , मलेरिया , हैजा आदि संक्रामक रोग खुद ब खुद नष्ट हो जाते हैं । पूर्व के वर्षों में वैज्ञानिकों ने गंगाजल का परीक्षण करके उसे रोग रहित पाया और उसकी आलौकिक शक्तियों का प्रमाण भी जनमानस को बताया । गंगाजल से कुछ डॉक्टरों ने कुष्ट रोग दूर करने की औषधि भी निर्माण की । ऐसे हजारों लोग मिल जाएंगे जो बताते हैं कि गंगाजल के नियमित सेवन से कब्ज पुराना ज्वर , श्वास रोग , संग्रहणी , मंदागिनी सभी रोगों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है । क्योंकि स्वतः गंगाजल में शुद्ध रहने और शुद्ध करने की अपार शक्ति है । गंगा के अतिरिक्त अन्य सभी नदियों का जल खराब हो जाता है इसका वास्तविक वैज्ञानिक कारण अभी तक अज्ञात ही है । संभवत: गंगा के उद्गम स्थल गोमुख पर या उसके नीचे कोई अदृश्य रसायनिक प्रक्रिया निरंतर होती है । जिससे इसमें यह गुण आता है।
                गंगाजल के अत्यंत चमत्कारी गुणों के कारण आज भी प्रत्येक हिंदू संप्रदाय में मृत्यु शैया पर पड़े हुए व्यक्ति को गंगाजल पिलाने की अनिवार्यता शायद इस रूप में प्रचलित है कि मां गंगा का सर्वरोग निराकारी जल मृत्यु शैया पर पड़े व्यक्ति को जीवन प्रदान कर सके ?
 गंगा की महिमा में हिंदी साहित्य में तो इतना तक कह डाला है कि जहां पर गंगा ना हो वहां गंगा के प्रवाह को मन में मान कर स्नान कर लेना चाहिए ! इस काम चलाउ विधान के कारण ही देश के विभिन्न भागों में गंगा नाम धारिणी अनेक जल धाराएं हैं ! गंगा के महामात्य के विषय में अनेकों जगह कहा गया है कि गंगा के प्रवाह से 150 हाथ दूर तक की भूमि पवित्र हो जाती है व उस क्षेत्र में गंदगी फैलाना अक्षम्य अपराध है । भारतीय संस्कृति और सभ्यता ओर साहित्य ने गंगा नदी को नदी के रूप में नहीं बल्कि उसे देवी के रूप में में वर्णित किया है । गंगा की बढ़ते हुए गौरव को देख तंत्र शास्त्र भी इसकी अवहेलना नहीं करते हैं ! योग साधकों ने भी गंगा को अपार सम्मान दिया उन्होंने भी अपनी क्रियाओं में गंगा को स्थान देकर भूतल पर बहती गंगा को असामान्य बताकर अपनी योगसाधनाओं को गंगा का अलौकिक रूप बतलाया है।
       इन सब से गंगा की महिमा चहूंओर बढ़ती जा रही है । गंगा केवल एक नदी मात्र ना रहकर हमारी संस्कृति का प्रतीक बन गई है । शिलालेखों में गंगा की महिमा, ध्वजों पर गंगा का चिन्ह ,देव मंदिर में गंगा की मनोहर मूर्तियां इन सब बातों को मिलाकर गंगा नदी से देवी और माँ बन गई है और गंगा के भक्तों ने देवी गंगा की कथाएं पुराणों में भी खोज निकाली और निकाल रहे हैं ।
  सम्रद्ध’ सौभाग्यम सलकवसुधाया: किमपि तन्भ हेश्वयर लीलाजनितजगत: खण्डपरशो: !
श्रुतीनां स्वस्वं सुकृतमथ मूर्त सुमनसां
सूधासौन्दर्य ते सलिल मशिवं न शमयतु !!
     अर्थात हे गंगे ! अपूर्व अमृत के तुल्य जल हम लोगों के पापों का नाश करें ! ऐसा जल , जो सारी पृथ्वी का संपूर्ण सौभाग्य अर्थात शोभा रूप है जो शिवजी की लीला से उत्पन्न हुआ है जिनकी बड़ी शोभा है । जो श्रुतियों (वेदों)का तत्व है और जो देवताओं का छुपा हुआ पुण्य है।
      दरिद्राणां दैन्य’ दुरितमथ दुवारसह्र्दा द्रुतँ दूरिकुर्वन स्करदुपगति दृष्टिसरणीम. !
अपि द्रागाविधाद्रुम दलन दीक्षा गुरुरिह 
प्रवाहस्ते वारंा  श्रीयमयमपारां दिशतु न: !!
     हे माता तेरा जल का यह प्रभाव हम लोगों को अपार लक्ष्मी दे ऐसा प्रवाह जो एक बार दृष्टिगोचर होने से दरिद्र की थी नेता को तुरंत दूर करता है और दुष्ट ह्रदय वालों के पापों का नाश करते हुए इस संसार में शीघ्र ही अविद्या रूपी वृक्ष के नाश करने में यह दीक्षा ( गुप्त मंत्र के उपदेश ) करने वाले गुरु की तरह है !
 न यत साक्षाद्वेदैरपि गलितभे दैरवसितं 
न यसिमन जीवानां प्रसरति मनोवागवसर: !
निरकरम नित्यं निजमहिमनिर्वासिततमो
विशुद्धम यतत्वं सूरततिनि तत्वमय न विषयः ।।  हे गंगे जो निर्भेद वेदों से भी ना कहा गया अर्थात जिनके वेद को या रहस्यों को वेदों ने भी नहीं पाया और निश्चित नहीं हुआ जिसमें प्राणियों के मन तथा वचन का प्रवेश नहीं है जो निराकार और नित्य है जिससे अविद्या रूपी अंधकार नष्ट होता है वही अति शुद्ध तत्व तुम हो परंतु विषय नहीं है अर्थात भागीरथ के कुछ प्रयोजन तथा सगर के पुत्रों के उद्धार के लिए तुम जल रूप में ही रहती हो …..
        पूर्व के वैज्ञानिकों आचार्यो ,ऋषियों , महाऋषियों या फिर पर्यावरणविदों चाहे कुछ भी कह ले जल संरक्षण की महत्ता को बरकरार रखने के लिए शायद धर्म के आसरे संरक्षण पर काम किया ! क्योंकि धर्म के नाम से लोंगो में भय रहता है और चींजे सँजोई जा सकती है शायद ऐसा मानना रहा हो ? जो काफी हद तक ठीक भी है । चीजो के संरक्षण के लिए सभी उपाय जायज है वरना मानव ने प्रकृति प्रदत्त अनेकों जीवन रूपी उपहारों को नष्ट कर दिया है या कर रहा है ? जिससे मानव जाति अजर अमर रह सकती थी ? पूर्व के आचार्य ऋषि, महा ऋषि यों या फिर पर्यावरण विदों की मान्यता धर्म के साथ प्रकृति का जुड़ाव और पूजा इससे प्रकृति का और वनस्पति का काफी हद तक संरक्षण संवर्धन हो रहा है और होगा ? उनका ऐसा सोचना जायज था ? ऐसा वर्तमान में प्रतीत होता है… खैर
       गंगा जल का महत्व और उससे धार्मिक जुड़ाव गंगा के अस्तित्व को समाप्त नही होने देगा ?… ऐसा सोचना सकारात्मक होगा ! मैं चाहता हूँ आप भी मेरी तरह सोचे….राकेश प्रजापति 
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