आस्था के आसरे से प्रदूषण की यात्रा..?

आरती धार्मिक धंधेबाजों का लोगों को बहला कर अपना उल्लू सीधा करने का कारगर तरीका है जिसे वे बिना सोचे समझे स्वीकार करते रहे हैं . वरना जिस भगवान की आरती द्वारा सुबह शाम स्तुति की जाती है उसने अब तक कितने भक्तों का भला किया है..?
आरती शब्द संस्कृत के “आर्ति ” का प्राकृत रूप है , जिसका अर्थ होता है दुख पीड़ा प्लेस प्लेस क्लेश चिंता बीमारी आदि लोक व्यवहार में आरती शब्द तथाकथित भगवान दिख भगबदीवग्रह की स्तुति के संदर्भ में रूढ़ हो हुआ है ।
” स्तुति ” पूजा पद्धति का एक अंग है , जिसे प्रशंसा गान का पर्याय कहा जा सकता है , स्तुतियों में देवी-देवताओं के गुणों का वर्णन करते हुए उन से स्वयं स्तुति करता अथवा विश्व के कल्याण की कामना की जाती है ।
धर्म के धंधेबाजों की देन

प्राचीन काल से ही आरती देवी देवताओं के गुणगान तक ही सीमित थी , कालांतर में आरती को पूजा पाठ का एक अंग बना दिया , प्रत्येक पूजन के अंत में आरती करना अनिवार्य मान लिया गया , स्कंद पुराण का कथन है :
मन्त्रहीनं क्रियाहींन यत कृतं पूजनं हरे !
सर्व सम्पूर्णतामेति कृते निराजने शिवे: !!
अर्थात मंत्र हीनं और प्रिया हीन होने पर भी पूजन में निराजन आरती से पूर्णता आ जाती है ,
ऐसा प्रतीत होता है कि सामान्य कर्मकांडीय पूजनों से जब धर्म के धंधेबाजो का पेट नहीं भरा तो उन्होंने आरती से पूजन की पूर्णता का हवाला देकर अतिरिक्त आय का साधन जुटाया , घर में सत्यनारायण की कथा हो या रामायण का अखंड पाठ अथवा अन्य कर्मकांड , संस्कार आदि सब के अंत में आरती जरूरी होगी , ताकि पंडितजी की आय बढ़े , पूजा-पाठ में दक्षिणा , चढ़ावा आदि का भार यजमान की जेब तक ही सीमित रहता है, जबकि आरती के नाम पर श्रोतागणों की जेब की खाली कर ली जाती है ।
धर्म के कुछ धंधेबाज चार कदम और आगे निकले, उन्होंने मंदिरों में सुबह-शाम आरती का विधान भी बना डाला , मध्यकालीन माधुर्योपासना जोड़कर कुछ धर्माचार्यों ने आठों पहर मंदिरों में आरती शुरू कर दी,
इन आरतीयों में मंदिर के गर्भगृह को घी से भरे दीपक से ज्योतित किया जाता है, यह दीपक चार बार मूर्ति के चरणों में , दो बार नाभि प्रदेश में ,एक बार मुख्मंडल पर और सात बार सर्वागों पर घुमाया जाता है ।
इस आरती विधान का अभिप्राय यह बताया जाता है कि सारी मूर्ति साफ-साफ चमक उठे , ताकि दर्शक या उपासक भली-भांति देवता की रूप छटा को देख सकें ।
प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि धर्म ग्रंथों में जिन देवी देवताओं को “शक्तिपुंज” और स्वत: प्रकाशमान कहा गया है, उन्हें छोटे से दीपक के कृत्रिम प्रकाश से प्रकाशित करने का क्या औचित्य ? उन देवताओं से तो समग्र विश्व प्रकाशित होता है न ?
लोक व्यवहार में “आरती करना” व “आरती लेना” शब्द भी प्रचलित है इनका आशय है इष्टदेव को अनिष्ट से बचाना अर्थात प्रभु के कष्टों को अपने ऊपर लेना , क्या इससे यह ध्वनित नहीं होता कि तथाकथित “प्रभु ” कष्ट में है , वह अक्षम है , धर्म के धंधेबाजों द्वारा उसे सर्वसक्षमता का मिथ्या कवच पहनाया गया है ?
बिचौलियों का गुणगान :-  यदि लोक प्रचलित ये आरतीयों पर एक नजर डाली जाए तो विदित होता है कि उनमें रचिताओं का असली मतलब तो बिचौलियों के गुणगान से ही था , इस संदर्भ में एक बहुप्रचलित आरती की कुछ पंक्तियां देखिए :
“ओsम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे,
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे,ओsम…..
जो ध्यावे फल पावे दुख बिन से मन का ,
सुख संपति घर आवे कष्ट मिटे तन का ,ओsम…
क्या आप बता सकते हैं कि सुबह शाम जिस जगदीश्वर की तन्मयता से गुहार लगाई जाती है , उसने अब तक कितने भक्तों के संकट दूर किए हैं ? क्या वे तथाकथित भक्त अब किसी प्रकार का कोई कष्ट अनुभव नहीं करते ? कितने भक्तों के घर ( बिना उनके कुछ किए ) उस जगदीश्वर ने सुख संपत्तियों से भर दिए हैं ?
कैसी विडंबना है कि एक ओर तो आरती में सुख संपत्ति के लिए गिड़गिड़ाया गया है , दूसरी ओर उसके अर्पण समर्पण की बात भी कही गई है : – ” विषय विकार मिटाओ , पाप हरो देवा ,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ , संतन की सेवा , तन मन धन जो कुछ है सब ही है तेरा , तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा ,
आख़िर यह विरोधाभास क्यों ? यह बिचौलियों की सोचिसमझी चाल है ,
जिसके अंतर्गत भगवान से ( या अपनी मेहनत से ) जो कुछ मिले वह भगवान के नाम पर बिचौलियों को दे दिया जाए , जैसा कि प्रत्यक्ष भी है कि तथाकथित भगवान् को अर्पित , समर्पित की जाने वाली कोई भी सामग्री भगवान ( यदि कहीं है तो ) तक नहीं पहुंच पाती , बिचौलिए ही उससे अपना पेट भरते हैं ।
यहां यह भी गौरतलब है कि भक्त और भगवान के बीच लेन-देन मैं संतों का क्या काम ? यह संत कौन है ? जिनकी सेवा की जाए ?
आरतीयों में भक्तों की दयनीयता भी झलकती है , जो जगदीश्वर की ” महानता ” के समक्ष उसे बोना ही बनाती है :-

“तुम करुणा के सागर , तुम पालनकर्ता .
मैं मूर्ख खल कामी , कृपा करो भर्ता .”
समझ में नहीं आता कि जब व्यक्ति यह जानता है कि वह मूर्ख , दुष्ट , कामी , विषय विकारी और पापी है तो वह अपनी इन इंदुरावृत्तियों से दूर रहने का प्रयास क्यों नहीं करता ? स्वप्रयास ही दुरावृत्तियों से दूर रख सकते हैं , कोई दूसरा ( जिसका अस्तित्व भी संदिग्ध है ) आ कर उसकी गलत आदतें छुड़ा देगा ? ऐसा सोचना अपनेआप को भुलावे में डालना है .!
लोक प्रचलित आरतीयों में गणेश की यह आरती भी अपना स्थान रखती है :-
” एकदंत दयावंत चार भुजाधारी ,
माथे पर सिंदूर सोहे मूसे की सवारी ,
अंधन को आंख देत कोढ़िन कौ काया ,
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया ,
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा ,
लड्अन को भोग लगे संत करें सेवा “
इस आरती में भी कई असंगत बातें कही गई है , पहली बात तो यह है कि सिंदूर नारियां लगाती हैं , उन्हें यह शोभा देता है , पुरुष को नहीं , दूसरे यह हास्यास्पद है कि भारी-भरकम गणेश जी का वाहन चूहा है , अंधों को आंखें , कौड़ियों को सुंदर शरीर , बांझो को पुत्र ( पुत्री नहीं ) आदि देना , यदि गणेश जी के हाथ में होता तो लोग डॉक्टरों के चक्कर क्यों काटते ? मैं अनेक ऐसे लोगों को जानता हूं जो सुबह गणेश जी की वंदना करते हैं , उनकी आरती उतारते हैं और दोपहर को चिकित्सकों की सेवा में जाते हैं , किंतु वर्षों से उन्हें ना तो आंखें मिली और ना ही उनकी गोद भरी !
इस आरती में यह भी विचारणीय है कि गणेश जी पर पान , फूल , मेवा , लड्डू आदि मूल्यवान खाद्य पदार्थ ही क्यों चढ़ाते है ? क्या ये चीजें स्वयं गणेश जी ग्रहण कर लेते हैं या उनके नाम और रूपाकार वाले बिचौलिए ! स्पष्ट है कि इन चीजों से बिचौलियों की ही सेहत बनती है .
अंत में संतों की सेवा की महिमा का गान कर के बिचौलियों ने अपना ख्याल भी रखवा लिया , गणेशजी को पूजो और हमें खिलाओ पिलाओ , अगर संतों को कुछ नहीं दोगे तो गणेश जी संतुष्ट न होंगे , बार-बार यह वाक्य गवा कर अर्धविकसित जनता के मन में संतों की सेवा के नाम पर पुजारियों पंडों की सेवा का बोझ थोप दिया गया है !
कुछ आरतीयों में विज्ञापनबाजी दिखाई देती है जैसे बालाजी की आरती में मेहंदीपुर के मेले का विज्ञापन दिया गया है :-
” घाटे मेहंदीपुर में शोभित दर्शन अति भारी ,
मंगल और शनि शनिश्चर मेला है जारी ”
अब जरा एक नजर आधुनिक युगीन धर्म के धंधे वाजों की नई खोज संतोषी माता की आरती पर भी डाल ले :-

जय जगदंबे , त्रिभुवन बंदे , सुर मुनि तेरा ध्यान धरे ,
जय संतोषी माता , तेरी महिमा चारों वेद करें ,
तू जगमाता , सृष्टि विधाता पालन और संहार करें ,
ब्रम्हा तेरी चरण धूलि ले अखिल जगत निर्माण करें ,
तैंतीस कोटि देवता तेरे सम्मुख स्तुति उच्चार करें ,

इन पंक्तियों को पढ़ते ही तथाकथित संतोषी माता और उनकी महिमा की कलई खुल जाती है , किसी भी वेद , पुराण , उपनिषद् आदि धर्म ग्रंथों में संतोषी माता का उल्लेख नहीं मिलता , मोटे तौर पर ब्रह्मा , विष्णु और शिव को ही क्रमशः सृष्टि का रचयिता , पालनकर्ता एवं संहारकर्ता बताया गया है , किंतु धंधेबाजी के नित नए हथकंडे अपनाने वाले कुशल व्यवसायी की तरह आधुनिक युगीन धर्म के धंधेबाजो ने संतोषी माता की खोज कर तथाकथित सर्वोच्च देवश्रेणी – ब्रह्मा , विष्णु और शिव को पूर्णत: पद दलित कर दिया है , ऐसी आरतियां रचियताऔ और आरती कर्ताओं के दिमागी दिवालियापन की ओर इंगित करती है ,
स्वार्थ औऱ दैन्य :-  यह अत्यंत खेद का विषय है कि लोग आरतीओं का आशय समझे बिना ही उन्हें गाने लगते हैं , वे इस ओर भी ध्यान नहीं देते कि उनके गाने बजाने या अनुनय विनय का उनके इष्ट देवता पर कोई अनुकूल प्रभाव पड़ भी रहा है अथवा नहीं , विगत कुछ वर्षों से तो भोंपूओं पर आरतियां गाइ जाने लगी हैं , इस संदर्भ में मुझे संत कबीर की ये पंक्तियां याद आ रही है :-
कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय ,
ता चढ़ी मूला बांग दे क्या बहरा भया खुदाय “
मेरे देखने सुनने में जितनी भी आरतियां आई है प्रायः सभी में इष्ट देवता के काल्पनिक एवं अतिशयोक्ति पूर्ण रूप सौंदर्य के साहचर्य मे रचिताओं / आरती कर्ताओं का स्वार्थ एवं दैन्य ही प्रमुखत: उधर कर आया है , यह स्वार्थ भी निजी सुख संपत्तिऔ तक की सीमित है, किसी भी आरती में देश अथवा समाज के उत्थान , विकास या कल्याण की भावना अभिव्यक्त नहीं की गई है ।
कोई भी आरती किसी भक्त को कोई रचनात्मक कार्य करने की प्रेरणा नहीं देती , उल्टे उसे अकर्मण्य ही बनाती है फलत: व्यक्ति बिना कुछ किए धारे ही सबकुछ पाना चाहता है , यहां तक की स्वयं आरती यानी याचना के दो बोल भी नहीं बोलना चाहता ,
इस अकर्मण्यता के फल स्वरुप व्यक्ति दिन हीन सा बन जाता है दीनता एक मानसिक दुर्बलता है , जो मनुष्य को दूसरे की दया पर जीने का प्रलोभन देती है , विवश करती है !
इसका एक दुष्परिणाम यह भी है होता है कि व्यक्ति का आत्मविश्वास टूट जाता है , ऐसे व्यक्ति ना तो स्वयं आगे बढ़ सकता है और ना ही दूसरों को आगे बढ़ा सकता है ।
आरती का आर्थिक पक्ष :- अब यदि आरती के आर्थिक पक्ष पर दृष्टिपात किया जाए तो विदित होता है कि यह सारा क्रिया कर्म धन व समय का अपव्यय है ।
पद्म पुराण के अनुसार कुमकुम , अगर , कपूर , घृत और चंदन की 7 या 5 बतियां जला कर दिए में रुई व घी की सात बत्तियां डालकर घंटा , शंख आदि बजाते आरती करनी चाहिए , किंतु सामान्यतः घृतपूर्ण दीपक से आरती की जाती है , आजकल कुछ लोग धूपबत्ती , अगरबत्ती इसमें शामिल कर लेते हैं । दीपक की बत्तियों की संख्या प्रायः विषम ही निर्धारित की गई है जैसे कि 1,3 ,5,7,9 आदि ,

असल में आरतीयों का उद्देश भगवत भक्ति उतनी नहीं जितनी बिचौलिया भक्ति है ,आरतीयों के माध्यम से संत , दान पुण्य ,सेवा आदि की महत्ता मन में बैठाई गई है , लोगों से रोज इन्हें गवा कर उनके मस्तिष्क को विवेक शुन्य कर दिया गया है , उन्हें यह लालच दिया गया है कि आरती से धनधान्य मिलेगा । इस लालच में भक्त बाकी बातों को भी मानने लगे , वह अपने आप को दिशाहीन समझकर बिचौलियों पंडों को ज्ञानी मानने लगे और उन्हें दान देना अपना कर्तव्य समझने लगे ।

आरतियों से प्रदूषण भी :- आरती के दीपक में घी और रूई जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड , कार्बन मोनोऑक्साइड आदि गैसे निकलती हैं , इनसे वायु प्रदूषित होती है , अनेक जगहों पर धूपबत्ती और अगरबत्ती आदि जलाकर भी पर्यावरण को प्रदूषित किया जाता है ।
आरती के समय शंख , घंटा , तालिया आदि बजाने से अनेक कर्णकटु ध्वनियां निकलती है , इससे वातावरण में शोर बढ़ता है , गली , मोहल्लों के मंदिरों में सुबह शाम होने वाली आरती को ध्वनि विस्तारक यंत्रों की सहायता से और भी विस्तार दिया जाता है , यह ध्वनि प्रदूषण का एक कारण है। वायु और ध्वनि प्रदूषण हमारे लिए कितने घातक है यह किसी से छिपा नहीं है , वायु प्रदूषण हमारे श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है और ध्वनि प्रदूषण श्रवण तंत्र को…!  सरिता १९९२

Share News

You May Also Like