फांसी के तख्ते पर अंतिम शब्द….

देश की आजादी के लिए फांसी के तख्ते पर झूल जाने वाले क्रांतिकारियों ने मौत को हंसते-हंसते लगाया था । फांसी पर चढ़ने के पूर्व उन्होंने जो अंतिम पत्र लिखें और जो कहा प्रस्तुत है उनमें से कुछ अंश :-
जिंदगी जिंदादिली को जानिए : रोशन
क्रांतिकारी रोशन सिंह को 19 दिसंबर को इलाहाबाद में फांसी दी गई उनका एक आखिरी पत्र 13 दिसंबर का लिखा हुआ है पत्र इस प्रकार है :
इस हफ्ते फांसी हो जाएगी । ईश्वर के आगे विनती है कि आपके प्रेम का आपको फल दें । आप मेरे लिए कोई गम ना करना । मेरी मौत तो खुश वाली है । चाहिए तो यह कि कोई बदफैली करके बदनाम होकर न मरे और अंत समय ईश्वर याद रहे । सो यही तो बातें हैं इसलिए कोई गम नहीं करना चाहिए । 2 साल बाल बच्चों से अलग रहा हूं । इसलिए ईश्वर भजन का अवसर मिला । इसलिए मोह माया सब टूट गई । अब कोई चाह बाकी न रहीं । मुझे विश्वास है कि जीवन की दुख भरी यात्रा खत्म करके सुख के स्थान पर जा रहा हूं ।शास्त्रों में लिखा है , युद्ध में मरने वालों की ऋषियों जैसी रहत होती है ।
जिंदगी जिंदादिली को जानिए रोशन वरना कितने मरे और पैदा होते जाते हैं
आखरी नमस्कार ।

तंग आकर हम उनके जुल्म से बेदाद से :- अशफाक उल्ला खां
 सुंदर , सजीले क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल के साथी । बिस्मल के साथ-साथ उन्हें भी फांसी की सजा सुनाई गई थी । फांसी के तख्ते पर चढ़ने के पूर्व अशफाक उल्ला ने कहा था :- मैंने कभी किसी आदमी के खून से अपने हाथ नहीं रंगे और मेरा इंसाफ खुदा के सामने होगा । मेरे ऊपर लगाए सभी इल्जाम गलत है ।
फ़नाह है हम सबके लिए , हम पर कुछ नहीं मौकूफ !

वफा है एक फकत जाने की ब्रिया के लिए !
तंग आकर हम उनके जुल्मों से बेदाद से , चल दिए सूए अदम जिन्दने फैजाबाद से ।

एक मिट जाने की हसरत :- क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल शायर भी थे ।फांसी के तख्ते की ओर जाते समय उन्होंने वंदे मातरम का जयघोष किया और शेर पढ़ा :- मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे !
बाकी ना मैं रहूं ना मेरी आरजू रहे !!
जब तक कि तन से जान रगों में लहू रहे !
तेरा ही जिक्रेयार , तेरी जुस्तजू रहे !!
फांसी के तख्ते पर खड़े होकर उन्होंने कहा — मैं ब्रिटिश साम्राज्य का पतन चाहता हूं फिर यह शेर पड़ा — अब ना अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़ ! एक मिट जाने की हसरत अब दिले बिस्मिल में है !! कारागार से बिस्मिल ने जो अंतिम पत्र लिखा था उसका एक अंश : – मैं खूब खुशी हूं 19 तारीख को प्रातः जो होना है उसके लिए तैयार हूं ! परमात्मा काफी शक्ति देंगे मेरा विश्वास है कि मैं लोगों की सेवा के लिए फिर जल्द ही जन्म लूंगा । सभी से मेरा नमस्कार कहें । दया कर इतना काम और भी करना कि मेरी ओर से पंडित जगत नारायण ( सरकारी वकील जिससे उन्हें फांसी लगवाने के लिए बहुत जोर लगाया था ) को अंतिम नमस्कार कह देना । उन्हें हमारे खून से लथपथ रुपयों से चैन की नींद आए । बुढ़ापे में ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे।

हिंदुस्तान कुंदन बन कर रहे :- अवध बिहारी

अवध बिहारी युवा क्रांतिकारी थे । उन्होंने बी ए पास कर सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज लाहौर से बीटी पास की । उन पर कई लिबर्टी पर्चे लिखने का आरोप था । अवध बिहारी को उत्तर प्रदेश और पंजाब की पार्टी का प्रमुख नियुक्त किया गया था । बे बड़े जिंदादिल थे और गुनगुनाते रहते थे:–

एहसान ना खुदा का उठाएं मेरी बला !
किश्ती खुदा पर छोड़ दूं लंगर को तोड़ दूं !!

इस शेर से ही पता चलता है कि वह कितने मस्ताने वीर थे । अवध बिहारी पर पर्चे लिखने और लारेंस गार्डन में बम चलाने का आरोप था ।उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी । कहते हैं कि फांसी लगने के दिन उनसे पूछा गया “आखरी इच्छा क्या है ” “यही कि अंग्रेजों का बेड़ा गर्क हो ” उत्तर मिला
कहा गया शांत रहो । आज तो शांति से प्राण दो । कहने वाला एक अंग्रेज था । अवध विहारी ने कहा देखो जी आज शांति कैसी ? मैं तो चाहता हूं कि आग भड़के ! चारों ओर आग भड़के ! तुम भी जलो, हम भी जले । हमारी गुलामी भी जले । आखिर में हिंदुस्तान कुंदन बन कर रहे । और फिर स्वयं फांसी का फंदा गले में डाल दिया ।

                                          ” स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ “

    

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